अवनीश पाठक | लोहरदगा/सेन्हा झारखंड में ऐसे तो जनजातीय परंपराओं के बीच नाच-गाना, गीत-संगीत की अलग ही पहचान है, परंतु इसमें जब तक ढोल, मांदर की थाप न सुनाई दे तब तक सब फीका है। अब मांदर की थाप से निकलने वाली मधुर ध्वनि जितनी मधुर सुनाई पड़ती है, उतनी ही मिठास मांदर के निर्माण में जुटे चमड़ू गांव के लोगों में भी दिखती है। हम बात कर रहे हैं लोहरदगा के सेन्हा प्रखंड अंतर्गत चमड़ू गांव की, जहां 100 वर्ष से अधिक समय से मांदर बनाना गांव का मुख्य व्यवसाय है। गांव में रहने वाले 25 से 30 घरों के 200 से अधिक लोगों का मुख्य व्यवसाय मांदर, ढाक व नगाड़ा का निर्माण कार्य करना है। गांव के नायक समाज के लोग सलाना 1000 से अधिक मांदर का निर्माण करते हैं, परंतु इसकी बिक्री सीजन के आधार पर होती है। मांदर की खरीदारी के लिए झारखंड की राजधानी रांची सहित अन्य जिलों से भी खरीदार पहुंचते हैं। वही गांव के ग्रामीण भी मांदर की बिक्री के लिए अलग-अलग बाजारों पर जाते हैं। मांदर बनाने वाले गांव के विमल नायक, रघु नायक, रंथू नायक, चांदो देवी, कुंती देवी, द्रोपदी देवी आदि ने बताया कि करमा और सरहुल के मौके पर यहां के मांदर की डिमांड काफी अधिक रहती है। यहां के मांदर सेन्हा प्रखंड के पूरे क्षेत्र के अलावे, किस्को, लोहरदगा, रांची, लातेहार, गुमला, रायडीह, जशपुर, मेदिनीनगर, लातेहार बेड़ो तक जाते हैं। जो मांदर लेने आते हैं, वह वहीं पर मांदर बजा कर देखते हैं। एक मांदर चार हजार से पांच हजार रुपए तक में बिक्री होता है। जिसके निर्माण में 2 से 3 हजार रुपए तक का खर्च आता है। नायक समुदाय के लोगों का कहना है कि नई पीढ़ी भी अपने विरासत पर मिली व्यवसाय में रुचि रखते है। पांच हजार रुपए तक दाम: गांव के 75 वर्षीय रंथु नायक का कहना है कि वर्ष 1971 में मांदर 15 रुपए में बिक्री होती थी, अब चार से पांच हजार रुपए में बिकती है। आज उनके इस कारोबार में उनके पोता पोती भी हाथ बंटा रहे हैं। यही कारण है कि पूरा परिवार मिलकर वर्षभर में 40 से 50 मांदर बना पाते हैं। इनका कहना है कि इस गांव में जब जाएं, मांदर मिलेगा। यहां के लोगों का रोजगार मांदर ही है, साथ ही जीविका का साधन भी। प्रकृति पर्व करमा में मांदर का महत्व बढ़ जाता है।


