निर्मल मन वाले को ही भगवान श्रीराम मिलते हैं: पं. आनंद

भास्कर न्यूज | कवर्धा ग्राम मोहगांव में पंचकुंडीय श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का आयोजन किया गया है। यह महायज्ञ गौ माता की रक्षा, ग्राम की सुरक्षा तथा विश्व कल्याण की भावना के साथ किया जा रहा है। यज्ञ में पं. आनंद उपाध्याय ने श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति और दान का संदेश दिया। कहा कि भगवान श्रीराम स्वयं कहते हैं कि वे केवल उसी को प्राप्त होते हैं, जिसका मन निर्मल हो। छल, कपट और विकारों से भरा मन प्रभु को प्रिय नहीं होता। यदि हम भगवान राम को पाना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने मन को शुद्ध और पवित्र करना होगा। आज मनुष्य का मन विकारों से ग्रस्त हो गया है, ऐसे में मार्गदर्शन के लिए हमें शास्त्रों की शरण लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट कहा है कि यदि मन मलिन हो, तो माता सीता के चरण कमलों की उपासना करनी चाहिए। माता सीता के भजन, स्मरण और चरणों की शरण से मन शुद्ध होता है और तभी भगवान राम की प्राप्ति संभव होती है।माता सीता ही हमें भगवान राम को पाने के योग्य बनाती हैं, जैसे राधा रानी की कृपा से श्रीकृष्ण, लक्ष्मी जी की कृपा से नारायण और माता पार्वती की कृपा से भगवान शंकर की प्राप्ति होती है। इसलिए शक्ति स्वरूपा मातृ शक्ति की आराधना आवश्यक है। उन्होंने समाज में नारी शक्ति के सम्मान पर जोर दिया। कहा कि सीता और राधा की अंशभूता नारी का आदर ही सामाजिक मर्यादाओं की स्थापना करता है। नारी सम्मान से ही समाज में सुख, शांति और कल्याण संभव है। कहा कि दान दो प्रकार का होते है, पर्व और विशेष अवसरों पर दिया जाने वाला दान व नित्य दान। शास्त्रों और श्री शिव महापुराण में नित्य दान की विशेष महिमा बताई गई है। सामान्य दिन में दान से एक गुना, अमावस्या में सौ गुना, कर्क संक्रांति में हजार गुना, मकर संक्रांति में दस हजार गुना तथा ग्रहण काल में लाख गुना पुण्य फल प्राप्त होता है। नित्य दान करने से इन सभी तिथियों का पुण्य फल स्वतः प्राप्त हो जाता है। उन्होंने बताया कि सवा रुपये प्रतिदिन के हिसाब से यह दान वर्ष में 450 रुपये और आजीवन लगभग 45 हजार रुपये होता है, जिसे परिवार के प्रत्येक सदस्य को करना चाहिए। यह राशि शंकराचार्य आश्रम में समर्पित की जाती है। उन्होंने कहा कि यज्ञ शब्द यज धातु से बना है, जिसका अर्थ देवपूजा, संगति और दान है। यज्ञ के माध्यम से देवताओं की आराधना होती है और वे भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यज्ञ और अनुष्ठान से ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।

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