भास्कर न्यूज| सरायकेला कहते हैं कि फूलों की खुशबू खराब मूड में चल रहे लोगों और बेजुबान जानवरों को भी मदमस्त कर अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। ठीक उसी प्रकार प्रकृति और कला प्रेमियों के जीवन में कला का स्थान माना जाता है। जो सात समंदर पार भी अपनी कला की खूबसूरती से कला प्रेमियों को आकर्षित करती है। जानकार इतना तक बताते हैं कि कला की भाषा बेजुबान जानवर भी बिना शिक्षा के सीख जाते हैं। जिसके अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं। वहीं कला ही एक ऐसी विधा है जो जीवन को सुंदर बनाने के साथ-साथ वास्तविक जीवन की खुशियों को उभारती है। कुछ ऐसे ही जज्बातों को अपने हृदय में समाहित कर जीवन का सफर कर रही कर्नाटक की अंजलि देसाई सरायकेला पहुंची। उन्होंने कला के प्रति अपने विश्वास को उजागर करते हुए कहा कि “आर्ट इज साइंस, नॉट जस्ट ए सब्जेक्ट, बट ए वे ऑफ लाइफ’। अंजलि विवाह के पश्चात भी अपने पति वासुकी एन टी की प्रेरणा से वे अपना नृत्य सफर जारी रखी हुई है। जिसका एकमात्र उद्देश्य उन्होंने बताया है कि आने वाली पीढ़ी नृत्य कलाकारों को प्रेरित करना और नृत्य कला का संरक्षण व संवर्धन करना तथा भारत भूमि के रिच डांस हेरिटेज के लिए कार्य करना है। सरायकेला के विषय में उन्होंने कहा कि सरायकेला उन्हें हमेशा अपने दूसरे घर की तरह महसूस होता है। सरायकेला की सांस्कृतिक परंपरा जमीन के साथ बांधने का कार्य करती है। कर्नाटक की अंजलि देसाई एक प्रतिष्ठित वर्सेटाइल परफॉर्मिंग आर्टिस्ट हैं। वर्तमान में परफॉर्मिंग आर्ट्स पर पीएचडी कर रही अंजलि देसाई ने शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम, कथक एवं सरायकेला छऊ नृत्य कला में अपनी विशेष पहचान स्थापित की है। अंजलि देसाई रजतेंदु कला निकेतन पहुंच कर कला निकेतन प्रमुख सीनियर फेलोशिप अवार्डी रजतेंदु रथ से मुलाकात की। इस अवसर पर उन्होंने सरायकेला छऊ के इतिहास, मूल स्वरूप और परंपराओं के संबंध में विस्तार पूर्वक जानकारी हासिल करते हुए चर्चा की।


