पंचायत चुनाव:प्रदेश की आखिरी ग्राम पंचायत सांई टांगरटोली में सभी परिवार बदल चुके धर्म, कागजों में आज भी आदिवासी

मैं प्रसन्न राम, पांच वक्त का नमाजी, चुनाव लड़ने के लिए अब भी आदिवासी मैं छत्तीसगढ़ की आखिरी ग्राम पंचायत साईटांगरटोली में हूं। यहां ग्राम पंचायत चुनाव का प्रचार चल रहा है। कहने के लिए यह गांव आदिवासी आरक्षित है, लेकिन मुस्लिम बाहुल्य हो चुका है। गांव के बृजेश सिंह ने बताया कि 1970 में इस ग्राम पंचायत में 32 घर आदिवासी और 30 घर मुस्लिम थे। धीरे-धीरे सभी धर्मांतरित हो गए। गांव में 1760 वोटर हैं। इसमें से केवल 90 वोटर ही ईसाई हैं, बाकी मुिस्लम हैं। यहां केवल एक ही आदिवासी परिवार है प्रसन्नराम। वह भी धर्मांतरित हो चुका है। 25 साल में 15 साल उसके परिवार के लोग सरपंच रहे। अब उसका नाम बारिस अली हो चुका है, लेकिन वह बाहर सभी को प्रसन्नराम ही बताता है। पत्नी-बेटी को बनाया सरपंच उम्मीदवार
गांव के मोड़ पर ही एक नया मकान बन रहा है। लोगों ने बताया वहीं प्रसन्नराम मिलेगा। हम वहां पहुंचे तो एक लंबी दाढ़ी रखे हुए व्यक्ति से मुलाकात हुई। पूछने पर उसने बताया कि मैं प्रसन्नराम हूं। जाति से गौड़ आदिवासी हूं। पांच टाइम का नमाजी हूं। हज नहीं जा पाया हूं, लेकिन जब ऊपर वाला बुलाएगा तो जाऊंगा। मैं 50 साल पहले यहां आया था। मेरे 2 बेटे और 4 बेटियां हैं। बेटा जुमे की नमाज पढ़ता है। अभी वो सरपंच है, लेकिन मैं उसके कामों से खुश नहीं हूं। इसलिए इस बार सांईटागरटोली महिला आरक्षित होने से पत्नी जयमुनी बाई और बेटी शगुफ्ता को चुनाव लड़ा रहा हूं। कुल चार लोगों ने नामांकन किया है। अन्य प्रत्याशी जब्बार की दूसरी आदिवासी पत्नी सुमंती बाई और पहले सरपंच रह चुकी अहमद की पत्नी मार्सेला एक्का हैं। प्रसन्नराम, पत्नी व बेटा रह चुके हैं सरपंच गांव के बाहर सेवा केंद्र पर उपसरपंच नावेद ने बताया कि 1999 से पहले ये ग्राम पंचायत सामान्य थी। फिर आदिवासी आरक्षित हुई। तब गांव में केवल प्रसन्नराम ही आदिवासी था। वह चुनाव लड़ा और जीता। 2004 में अहमद ने मार्शेल एक्का नाम की आदिवासी लड़की से शादी की। उसे चुनाव लड़ाया और वह जीत गई। 2009 में प्रसन्न राम की पत्नी सरपंच बनीं। 2013 में जब्बार ने आदिवासी पत्नी प्रवीण कुजूर को लड़ाया और वह सरपंच बन गईं। अभी प्रसन्नराम का बेटा दुबराज सरपंच है। इस पंचायत में 6 मुस्लिम ऐसे हैं जिन्होंने आदिवासी लड़कियों से शादी की है। जब्बार की तो 4 बीवियां हैं। अभी चुनाव में ये आदिवासी पत्नियां या प्रसन्नराम का परिवार ही लड़ता और जीतता है। प्रदेश का सबसे खतरनाक गांव
जशपुर के एसपी शशिमोहन सिंह बताते हैं कि यह गांव गौतस्करी का शेल्टर होम था। पूरे प्रदेश से गायें यहां लाकर रखी जाती थीं और वहां से बांग्लादेश भेजी जाती। जब मैं जशपुर आया तो पता चला कि इस गांव में पुलिस का जाना प्रतिबंधित है, क्योंकि यहां जो भी गया उस पर हमला होता ही था। मैंने ऑपरेशन शंखनाद प्लान किया। हमने सबसे पहले इनको संरक्षण देने वाले मुखिया को जेल भेजा। गोतस्करी में पकड़ी जाने वाली गाड़ियों को राजसात करना शुरू किया। एक दिन बड़ी रणनीति बनाकर हम इस गांव में घुसे तो पहले महिलाओं ने हमला किया। उन्हें शांत किया और गायें जब्त की। अब गांव के हालात ठीक हैं।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *