चंडीगढ़ जिला अदालत ने पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन लिमिटेड को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने 8.13 करोड़ रुपये की वसूली से जुड़े मामले में दायर आपत्ति याचिका खारिज कर दी। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डॉ. हरप्रीत कौर ने कहा कि मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) का फैसला कानून के अनुसार है और उपलब्ध सबूतों पर आधारित है। ऐसे में अदालत को इसमें दखल देने का कोई कारण नहीं है। जानिए पूरा मामला क्या था पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन लिमिटेड ने मेसर्स बगाड़िया ब्रदर्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ 8,13,81,676 रुपये और ब्याज की वसूली के लिए मध्यस्थता में दावा किया था। मामला वर्ष 2002-03 का है, जब बगाड़िया ब्रदर्स ने बांग्लादेश को गेहूं-चावल निर्यात के लिए पंजाब एग्रो से समझौता किया था। इस संबंध में दोनों पक्षों के बीच एमओयू और बाद में एसोसिएट एग्रीमेंट भी हुए थे। पंजाब एग्रो का दावा था कि निर्यात पूरा होने के बावजूद बगाड़िया ब्रदर्स ने पूरी राशि का भुगतान नहीं किया। वहीं, बगाड़िया ब्रदर्स ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उन्होंने पूरा भुगतान कर दिया है और कोई बकाया नहीं है। आर्बिट्रेटर ने किया दावा खारिज मामले में नियुक्त एकल मध्यस्थ जस्टिस एनके सूद (सेवानिवृत्त) ने 1 फरवरी 2018 को पंजाब एग्रो का दावा खारिज कर दिया था। अपने फैसले में उन्होंने कहा कि पंजाब एग्रो अलग-अलग समय पर अलग-अलग रकम मांगता रहा। कई बार मौका और निर्देश देने के बावजूद वह अपने दावे के समर्थन में पुख्ता दस्तावेज पेश नहीं कर सका। सुप्रीम कोर्ट फैसलों का हवाला सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आर्बिट्रेशन कानून का उद्देश्य अदालतों के हस्तक्षेप को सीमित रखना है। जब मध्यस्थ द्वारा दिया गया अवॉर्ड कानून और रिकॉर्ड के अनुरूप हो, तो उसे केवल अलग राय के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि इस मामले में मध्यस्थ द्वारा दिया गया फैसला कानूनी रूप से सही है और उसमें किसी तरह की गंभीर खामी नहीं है। इसी आधार पर पंजाब एग्रो की आपत्ति याचिका खारिज कर दी गई। अदालत ने माना कि मध्यस्थ का अवॉर्ड न तो कानून के खिलाफ है और न ही सार्वजनिक नीति के विरुद्ध। इसलिए पंजाब एग्रो की आपत्ति याचिका खारिज की जाती है। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता पर लागत भी लगाई।


