पंजाब में बरनाला के ठुल्लेवाल गांव के युवा किसान सतनाम सिंह ने 10 साल पहले खेती में नई राह चुनी। उन्होंने गुजरात से ड्रैगन फ्रूट की पौध लाकर आधा एकड़ से कम जमीन में लगाई। उस समय बरनाला जिले में किसी ने भी इस विदेशी फल की खेती के बारे में सोचा तक नहीं था। लगातार मेहनत और लगन से उन्होंने इस खेती का विस्तार चार एकड़ कर लिया। इसके जरिये वह लाखों रुपए कमाते हैं और 5-6 लाेगाें को रोजगार दे रखा है। सतनाम की प्ररेणा से करीब 200 किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती से जुड़ गए हैं।39 वर्षीय कंप्यूटर इंजीनियर सतनाम के मुताबिक, यह वैकल्पिक खेती है, जो साधारण फसलों से अलग है। इसमें पौधों को सहारा देने के लिए खेत में सीमेंट या कंक्रीट के खंभे गाड़ने पड़ते हैं। खंभों पर गार्ड (लोहे/सीमेंट की रिंग) लगाई जाती है, ताकि पौधा ऊपर चढ़ सके और बेल की तरह चारों ओर फैल सके। यह पौधा दिन में धूप और रात में नमी पसंद करता है। गर्मी-सर्दी, दोनों मौसम सह लेता है, लेकिन ठंडी हवाओं से बचाना जरूरी है। लगभग 12-18 महीने बाद पौधा फल देना शुरू करता है। एक बार लगाया पौधा 20 साल तक फल देता रहता है। ड्रैगन फ्रूट का सीजन और कमाई उनके मुताबिक, ड्रैगन फ्रूट सीजन 5-6 महीने का होता है। जुलाई से लेकर नवंबर तक यह फल देता है। इस वक्त इसका पीक सीजन चल रहा है। वह खुद ही फल की तुड़ाई करवाकर पैकिंग कराते हैं और मंडियों में बेचते हैं। बरनाला, संगरूर, बठिंडा, लुधियाना जैसे मंडियों में यह हाथों-हाथ बिक जाता है। पेमेंट नगद और मुनाफा भी अच्छा। एक एकड़ में एक साल में 30 से 35 क्विंटल की पैदावार होती है। एक किलो फल की कीमत लगभग 150 रुपए होती है। पारंपरिक फसलों से बेहतर विकल्प उनके अनुसार, यह फल न केवल पारंपरिक फसल चक्र (गेहूं-धान) से निकलने का न सिर्फ बेहतर रास्ता है, बल्कि यह उस सीमावर्ती सूबे के किसानों को बेहतर मुनाफे और नए बाजारों से जोड़ता है, जहां भूजल संरक्षण के लिए मारामारी मची है। लिहाजा, ड्रैगन फ्रूट की खेती में पानी की खपत कम होती है और बाजार में कीमत भी अच्छी मिलती है। यही कारण है कि अब किसान धीरे-धीरे इस कृषि का रुख कर रहे हैं। संपर्क करें- सतनाम सिंह से अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें- 97798–46777


