पटवारी ने ग्रुप पर लिखा- मेरे परिवार को छोड़ दो:मंडला कलेक्टर पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप, जमीन के मामले को लेकर किया था सस्पेंड

मेरे पत्नी-दोनों बच्चों को किन्हीं लोगों ने तीन दिन से घर में बंद कर दिया है और उनके पास डिवाइस लगा दी है… मेरी उन लोगों से अपील है कि मैं आपको नहीं जानता, मेरे परिवार को रिहा कर दो। यह एक वॉट्सऐप मैसेज है, जो मंडला के पटवारी संदीप कुशवाहा ने 18 दिसंबर को जिले के पटवारियों के ग्रुप में भेजा था। उस समय कुशवाह निलंबित थे। जब इस मैसेज को बाकी पटवारी साथियों ने देखा तो उन्होंने आशंका जताई कि कुशवाहा तीन महीने से निलंबित है इसलिए उसकी मानसिक स्थिति खराब हो गई है। इसके लिए उन्होंने कलेक्टर सोमेश मिश्रा समेत प्रशासन के कई अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया। पटवारी संघ के दबाव के आगे संदीप कुशवाहा का कलेक्टर ने निलंबन तो खत्म कर दिया, मगर जिला प्रशासन का कहना है कि कुशवाहा को प्रशासनिक लापरवाही के चलते निलंबित किया गया था। पटवारी संघ इस मामले में राजनीति कर रहा है। आखिर क्या है ये पूरा मामला, पढ़िए रिपोर्ट… पटवारी कमरे में बंद मिला, इलाज के लिए गया नागपुर
इस मैसेज के बाद साथी पटवारी, अनहोनी की आशंका से घबराकर, तुरंत संदीप के लालीपुर स्थित घर की ओर भागे। वहां का दृश्य दिल दहला देने वाला था। परिवार ने बताया कि संदीप ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है और किसी से बात नहीं कर रहा। बड़ी मुश्किलों के बाद जब उसे बाहर निकाला गया, तो उसकी हालत बेहद खराब थी। वह डरा हुआ था, सहमा हुआ था और ऐसी बातें कर रहा था जिनका कोई सिर-पैर नहीं था। उसकी बिगड़ती हालत को देखते हुए, संघ के लोग उसे तुरंत इलाज के लिए नागपुर ले गए। पटवारी संघ का आरोप- मानसिक प्रताड़ना दी जा रही थी
संदीप के मानसिक संतुलन खोने की खबर जिले में फैली, तो पटवारियों का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने एकजुट होकर प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस बीच, मामले को शांत करने की कोशिश में प्रशासन ने आनन-फानन में संदीप कुशवाहा का निलंबन वापस लेते हुए उसे बहाल कर दिया। जिला पटवारी संघ के अध्यक्ष जितेंद्र बैरागी ने इस मामले में सीधे तौर पर तत्कालीन कलेक्टर सोमेश मिश्रा और अन्य अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा, “पटवारी संदीप कुशवाहा को कलेक्टर और अधिकारी मिलकर कई महीनों से मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। पहले तो वह चुपचाप सब कुछ सहता रहा, लेकिन जब दबाव बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो वह टूट गया। एक जमीन का सौदा बना विवाद और निलंबन की वजह
जितेंद्र बैरागी ने बताया कि पटवारी संदीप के मामा-मामी की एक कीमती जमीन शहर के बायपास से लगी हुई है। इसी से सटकर एक सफेदपोश समाजसेवी और व्यवसायी संजय तिवारी की जमीन है। तिवारी की जमीन तक आने-जाने का रास्ता केवल पटवारी के मामा-मामी की जमीन से ही होकर गुजरता है। इसलिए, व्यवसायी संजय तिवारी ने इस जमीन का सौदा किया और रजिस्ट्री भी करा ली। रजिस्ट्री के बाद तय सौदे की रकम को कम करने के लिए पटवारी संदीप पर दबाव बनाया जाने लगा। बैरागी का आरोप है कि व्यवसायी संजय तिवारी ने कलेक्टर सोमेश मिश्रा को यह कहकर गुमराह किया कि यह जमीन पटवारी संदीप की ही है। इसके बाद कलेक्टर ने एसडीएम और तहसीलदार को बुलाकर निर्देश दिए कि इस जमीन के दाम कम कराए जाएं। आरोप है कि इसके बाद एसडीएम और तहसीलदार ने पटवारी संदीप को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर उस पर रुपए कम लेने का दबाव बनाया। संदीप ने बार-बार कहा कि यह जमीन उसके मामा-मामी की है और इस सौदे में वह कुछ नहीं कर सकता। बैकडेट में सस्पेंशन का लेटर थमाने का आरोप
जितेंद्र बैरागी ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने बताया, “पटवारी को सस्पेंशन ऑर्डर 15 सितंबर को थमाया गया, जिसमें उसे 2 सितंबर से निलंबित करने का आदेश लिखा था। यह पूरी तरह से अवैध है। इतना ही नहीं, उसे प्रताड़ित करने के लिए एक बेनामी शिकायत के आधार पर उसकी जांच शुरू करा दी गई। उस शिकायत पर शिकायतकर्ता का न तो पूरा नाम था, न कोई मोबाइल नंबर और न ही कोई पता। ऐसी फर्जी शिकायत पर जांच बैठाना केवल संदीप को मानसिक रूप से तोड़ने की साजिश का हिस्सा था।” जब तीन महीने तक निलंबन और जांच का दबाव बढ़ता गया, तो संदीप का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। पटवारी संघ का कहना है कि जब संदीप के व्हाट्सएप मैसेज के बाद पटवारियों में आक्रोश पनपा, तो प्रशासन ने अपनी गलती छिपाने के लिए उसे बैकडेट में बहाल करके मामले को दबाने की कोशिश की। पटवारी संघ अब इस पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग कर रहा है। प्रशासन बोला- लापरवाही पर कार्रवाई, राजनीति कर रहा संघ
इन गंभीर आरोपों के जवाब में, जब दैनिक भास्कर ने तत्कालीन कलेक्टर सोमेश मिश्रा से बातचीत की, तो उन्होंने एक अलग ही तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा, “पटवारी संदीप कुशवाहा के खिलाफ एक शिकायत आई थी, जिसमें यह उल्लेख था कि उन्होंने अपनी नौकरी के दौरान शहर के आसपास ही तैनाती ली है और मौके की जमीनें खरीदकर बेनामी संपत्ति बनाई है। इस शिकायत को जांच के लिए भेजा गया था। उन्हें प्रशासनिक कार्यों में लापरवाही के चलते निलंबित किया गया था। बाद में उनके निवेदन पर उन्हें बहाल कर दिया गया।” कलेक्टर ने पटवारी संघ के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “पटवारी संघ इस मामले पर राजनीति कर रहा है। कलेक्टर और व्यवसायी की दोस्ती का सच क्या है?
भास्कर की पड़ताल में यह बात सामने आई कि कलेक्टर सोमेश मिश्रा और व्यवसायी संजय तिवारी के बीच पुरानी और गहरी जान-पहचान है। हालांकि लोग इस पर खुलकर बोलने से कतराते हैं, लेकिन पटवारी संघ ने प्रभारी मंत्री को जो ज्ञापन सौंपा उससे इसकी पुष्टि होती है। ज्ञापन में साफ लिखा है कि संजय तिवारी, कलेक्टर से अपनी निकटता का फायदा उठाकर शिक्षा का व्यवसायीकरण कर रहे हैं। तिवारी शहर के सबसे पुराने ज्ञानदीप इंग्लिश मीडियम स्कूल में सेक्रेटरी हैं, और इस स्कूल का पदेन अध्यक्ष कलेक्टर ही होता है। यह भी आरोप है कि व्यवसायी ने अपने शोरूम के पास एक सार्वजनिक निस्तार के कुएं को भी भरवा दिया, लेकिन कलेक्टर से निकटता के चलते उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। खौफ में परिवार, पहली बार सामने आया पीड़ित पटवारी
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पीड़ित पटवारी संदीप कुशवाहा और उनका परिवार बेहद दबाव और खौफ में है। नागपुर से इलाज कराकर लौटने के बाद से पूरा परिवार घर में ही कैद है और किसी से बात नहीं कर रहा। जब दैनिक भास्कर की टीम ने संदीप से बात करने की कोशिश की, तो परिवार घर पर ताला लगाकर कहीं चला गया। पटवारी संघ के साथियों ने कॉल किया, लेकिन संपर्क नहीं हुआ। बाद में संदीप की पत्नी ने फोन पर बताया कि वे मंदिर गए हैं, लेकिन देर शाम तक घर नहीं लौटे। आखिरकार, देर रात घर की जलती लाइट्स ने बताया कि परिवार अंदर ही है। स्थानीय लोगों के साथ पहुंचकर जब भास्कर रिपोर्टर ने पीड़ित परिवार से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने रुआंसे होकर मना कर दिया। काफी समझाने के बाद, आखिरकार संदीप डरते-डरते बात करने को राजी हुए। इतने दिनों के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच पहली बार सामने आए संदीप ने कहा कि सस्पेंड होना तो दूर, 18 साल की नौकरी में मुझे आज तक एक नोटिस भी नहीं मिला है। मेरा करियर बेदाग रहा है। मैं ग्रामीण अंचलों में भी पदस्थ रहा और सभी जगह अधिकारियों ने मेरे काम की सराहना की, लेकिन सितंबर से सब कुछ बदल गया।

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