पठानकोट में मुरादपुर के 60 वर्षीय किसान राकेश डडवाल पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू), चंडीगढ़ से पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उनकी शुरू से ही खेती-बागवानी में रुचि थी, इसलिए पढ़ाई पूरी कर इसी में जुट गए। उन्होंने गेहूं-धान की पारंपरिक खेती छोड़ लीची के बागान को वैज्ञानिक और आधुनिक खेती में बदल दिया, जो मुनाफा दे रही है। अब परिवार की चौथी पीढ़ी ने इसे और आधुनिक बना दिया। वह लंदन-दुबई के लिए निर्यात कर रहे हैं। वह जिला स्तर पर कई बार और 2013 में तत्कालीन सीएम प्रकाश सिंह बादल के हाथों श्रेष्ठ लीची उत्पादक के बतौर सम्मानित हो चुके हैं। उन्होंने बाग में तीन टन क्षमता का कोल्ड स्टोर बना रखा है। वह मार्गदर्शन के लिए बागवानी विभाग के लगातार संपर्क में रहते हैं। 80 एकड़ जमीन में फलों का बाग उनके पास करीब 80 एकड़ जमीन है। वह 100 फीसदी खेतों में लीची, आम, अमरूद व अन्य फल उगाते हैं। वह अच्छी वैरायटी (देहरादून और कलकतिया) की लीची पैदा करते हैं। बताते हैं कि देश के पूर्व चीफ जस्टिस मेहरचंद महाजन पठानकोट में लीची के जनक हैं। वह 1935 में मुजफ्फरनगर (बिहार) से लीची और आम के पौधे लाए थे। तीन पौधों से खड़ा किया बाग इन्होंने उनके दादा ऊधम सिंह को लीची के तीन पौधे दिए थे, जिन्हें अपने खेतों में लगा लिया। इन पर अच्छे फल आए। इससे प्रेरित होकर पिता रघबीर सिंह ने 1960 में 10 एकड़ में लीची के पौधे लगाए। बागान से फायदा होने पर अब उनके पास 70 एकड़ से अधिक में लीची का बागान है। चौथी पीढ़ी में बीएससी एवं होटल मैनेजमेंट में शिक्षित बेटा 30 वर्षीय सिद्धार्थ डडवाल बागान संभालने में हाथ बंटाते हैं। ताया के बेटे दलजीत सिंह और कर्नल केएस राजपूत के पास 90 एकड़ में लीची के बाग हैं। इस परिवार से प्रेरित होकर गांव के अधिकतर किसानों ने पारंपरिक खेती छोड़ लीची के बाग लगा लिए। गांव में 300 एकड़ में लीची के बाग राकेश के अनुसार, गांव में 300 एकड़ और जिले में 4000 एकड़ में लीची के बाग हैं। पठानकोट लीची ग्रोवर्स एसोसिएशन के 400 सदस्य हैं, जिसके वह प्रधान हैं। कई किसानों के पास 40, 30 या 20 एकड़ में लीची के बाग हैं। इनमें से कुछेक का सालाना टर्नओवर करोड़ रुपए से अधिक है। शरीफ चक्क, कोटली, जमालपुर, भोआ, सुंदरचक्क व मनवाल गांव में भी लीची के बाग साल-दर साल बढ़ रहे हैं। आटोमैटिक फॉगिंग मशीन कराते हैं उपलब्ध सुजानपुर में लीची एस्टेट बना है, जहां हर साल लीची मेला लगता है। यहां आटोमैटिक फॉगिंग मशीन और ट्रैक्टर किसानों को उपलब्ध कराए जाते हैं। इस साल जिले में 40 हजार मीट्रिक टन लीची का उत्पादन हुआ। यहां प्रति हेक्टेयर 16 मीट्रिक टन लीची की पैदावार होती है, जो देश में सर्वाधिक है। कई बड़े शहरों के व्यापारी यहां से लीची ले जाकर दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, कोलकाता तक पहुंचाते हैं। 12 क्विंटल लीची दुबई एक्सपोर्ट की उन्होंने (राकेश ने) 2024 में सरकारी एजेंसी पेडा की मदद से 12 क्विंटल लंदन और इस बार 12 क्विंटल लीची दुबई भी एक्सपोर्ट की। सरकार कोल्ड स्टोर और पैकिंग बॉक्स बनाने को 50 फीसदी सब्सिडी देती है। उससे मांग है कि यहां से मुंबई, दिल्ली और कोलकाता के लिए ट्रेनों में फ्रोजन कोच लगाए जाएं, ताकि कम लागत पर लीची भेजी जा सके। फ्लाइट से भाड़ा 70 रुपए प्रति किलोग्राम पड़ता है। संपर्क करें : 98144-41821


