कामदेव साहू | महासमुंद जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर कौंदकेरा में बना मिट्टी, पत्थर का बांध केवल ढांचा नहीं, बल्कि उस संघर्ष का गवाह है जिसे किसानों ने अपनी मेहनत से खड़ा कर इलाके को सींचा है। 1965 के भयानक अकाल के बाद किसानों ने पत्नी-बहुओं के जेवर बेचकर यह बांध बनवाया। आज दशकों बाद भी इलाके में 300 एकड़ खेत की फसलें इसी बांध के पानी से लहलहा रहीं हैं। 1965 का भयावह अकाल आज भी इलाके के बुजुर्गों की स्मृतियों में ताजा है। खाने को अनाज नहीं, खेत सूखे और गांवों में हाहाकार था। उस दौर में कौंदकेरा के किसानों ने ठाना कि भविष्य में उनके गांव को ऐसी त्रासदी न झेलनी पड़े। गांव के खार में ऐसी जमीन थी, जहां बरसाती पानी ठहरता था। वहीं बांध बनाना फाइनल हुआ। यहां साढ़े तीन एकड़ जमीन थी, जो बांध के लिए कम थी। तब किसानों ने चंदा कर पड़ोसी गांव की डेढ़ एकड़ जमीन और खरीदी। इस बांध को बनाने किसी सरकारी योजना या ठेकेदार की मदद नहीं ली गई। किसानों ने आपसी सहमति से प्रति एकड़ 25 रुपए की दर से पैसे इकट्ठे किए। जिनके पास ज्यादा जमीनें थीं, उन्होंने ज्यादा योगदान दिया। पैसे ही नहीं, लोगों ने गहने, अनाज और यहां तक अपनी खेती तक बेचकर सहयोग किया। किसानों ने श्रमदान कर खुद बांध बनाया, नहर भी पानी रोकने के लिए लोहे के फाटक नहीं थे, तीन फीट ऊंचे लकड़ी के फाटक तैयार किए गए, ताकि सालभर जलभराव बना रहे। आज भी इस बांध में बारह महीने पानी रहता है। खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए करीब 3 किमी लंबी नहर बनाई गई। पहले यह मिट्टी की थी, बाद में सीमेंट की नहर बनाई गई, जो करीब चार फीट चौड़ी है। नहर निर्माण के दौरान जिन किसानों की जमीन रास्ते में आई, उन्होंने जनहित में अपनी जमीन दान कर दी। किसी ने भी मुआवजे की मांग नहीं की। यह क्षेत्र की पहली सीमेंटेड नहर बनी। आज इस बांध से 300 एकड़ भूमि में सिंचाई हो रही है। यदि कभी अकाल जैसी स्थिति भी आए, तो यही बांध पूरे गांव की खेती को बचाने में सक्षम है। वर्ष 2017 में तत्कालीन जनपद सदस्य योगेश्वर चन्द्राकर ने बांध और नहर लाइनिंग के लिए 20 लाख की स्वीकृति थी। जिला पंचायत सीईओ ने निरीक्षण कर इसे अद्वितीय संरचना बताया था। लेकिन तकनीकी खामियों और सरकार बदलने के कारण काम अधूरा रह गया।


