परंपरागत दोल यात्रा, कान्हा के संग गुलाल की होली खेलेगा सरायकेला

गोलक रंग और गुलाल का त्योहार होली का ख्याल आते ही हर मन हर्षित हो जाता है। नववर्ष के स्वागत और खुशी के त्योहार के रूप में होली के आगमन में अब मात्र कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। सरायकेला क्षेत्र में होली का त्योहार ब्रज की होली जैसा आनंद देता है। जिसे लेकर सरायकेला सहित पूरे जिले भर में तैयारी को लेकर उत्साह का माहौल देखा जा रहा है। वहीं पूर्णिमा तिथि को सरायकेला की परंपरागत दोल यात्रा को लेकर तैयारी जारी है। आध्यात्मिक उत्थान श्री जगन्नाथ मंडली सरायकेला के तत्वावधान में आयोजित होने वाली उक्त दोल यात्रा की तैयारी की मंडली के आयोजक प्रमुख के झारखंड रत्न ज्योति लाल साहू ने जानकारी दी है। क्या है दोल यात्रा : कुछ ब्रज की होली की तरह ही सरायकेला क्षेत्र विशेष की पुरानी परंपरा के तहत दोल यात्रा कर भगवान श्रीकृष्ण राधा के संग रथ (दोल पालकी) पर सवार होकर भक्तों के पास जाते हैं। जहां भक्त अपने दरवाजे पर स्वागत करते हुए उनका आशीष लेकर उनके साथ गुलाल की होली खेलते हैं। मान्यता रही है कि दोल यात्रा के दौरान भगवान श्री कृष्ण के रथ पर दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ज्योति लाल साहू बताते हैं कि सरायकेला में सरायकेला स्टेट के महाराजा उदित नारायण सिंहदेव के समय 1818 से दोल यात्रा की परंपरा रही है। जिसका निर्वहन 1990 से आध्यात्मिक उत्थान श्री जगन्नाथ मंडली सरायकेला द्वारा किया जा रहा है। सनातनी महा एकता का प्रतीक बना पूर्ण कुंभ इस वर्ष सरायकेला की परंपरागत दोल यात्रा के दौरान झांकी के रूप में प्रमुख आकर्षण रहेगा। उक्त जानकारी देते हुए आयोजक प्रमुख ज्योति लाल साहू ने बताया कि आध्यात्मिक उत्थान श्री जगन्नाथ मंडली सरायकेला द्वारा किए जा रहे दोल यात्रा के अनवरत 36 वर्ष पूरे होने पर अन्य परंपरागत घोड़ा नाच एवं काठी नाच के साथ-साथ महासंगम पूर्ण कुंभ की झांकी भी प्रस्तुत की जाएगी। उन्होंने सभी भक्त वृंदो से निवेदन किया है कि प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी सभी अपने-अपने द्वार पर गोबर लिप कर अल्पना एवं रंगोली से सजाते हुए दीप यज्ञ के साथ भगवान श्रीकृष्ण और माता राधा रानी का स्वागत करें। दोल यात्रा का शुभारंभ सरायकेला के कंसारी टोला स्थित प्राचीन मृत्युंजय खास श्री राधा-कृष्ण मंदिर से होता है। जहां गाजे-बाजे के साथ भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को सरायकेला राजमहल स्थित मंदिर से मृत्युंजय खास श्री राधा कृष्ण मंदिर लाया जाता है। वहां से माखन मलाई का भोग सेवन कराने के पश्चात दोल यात्रा का शुभारंभ करते हुए नृत्य संगीत के साथ हर्षोल्लास से नगर भ्रमण कराया जाता है। सरायकेला के ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि राजवाड़े के जमाने में मृत्युंजय दत्ता राज दरबार के शाही पनवाड़ी हुआ करते थे। जो राज परिवार एवं आगंतुक राजकीय मेहमानों के लिए शाही पान बनाया करते थे। उनके बनाए पानों की खासियत के कारण तत्कालीन सरायकेला राजा द्वारा उन्हें खास की उपाधि दी गई थी। साथ ही उनके आराध्य रहे भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के लिए मंदिर बनवाया गया था। इस कारण आज भी उक्त मंदिर को मृत्युंजय खास श्री राधा- कृष्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है।

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