हजारीबाग में केज फिश फार्मिंग ने मछली पालन में लाई क्रांति, दूसरे राज्य में भेजी जाती है मछलियां

हजारीबाग हजारीबाग जिले में मछली पालन और उत्पादन में केज कल्चर से क्रांतिकरी परिवर्तन आया है। परंपरागत मछली पालन की तुलना में केज कल्चर तकनीक से कम स्थान में ज्यादा मछलियों को पाला जाता है। मृत्यु दर काफी कम है। मछली को पानी से निकालना आसान है। हजारीबाग में पिछले साल 21000 मीट्रिक टन मछली उत्पादन का हुआ है। लगभग 21 करोड़ का व्यवसाय हुआ। 2022 में 15600 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ था। केज फिश कल्चर को बढ़ावा देने के लिए राज्य और केंद्र सरकार से 50 से 90 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता मिलती है। जिला मत्स्य पदाधिकारी प्रदीप कुमार सिंह बताते हैं कि उत्पादन को 24000 मीट्रिक टन करने का लक्ष्य है। इस व्यवसाय से स्थानीय स्तर पर 500 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। प्रधान मंत्री मत्स्य सम्पदा योजना से एससी, एसटी और महिला मछली पालकों को 60 प्रतिशत अनुदान देय है। राज्य संपोषित योजना से केज निर्माण में 90 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है। फीड, मछली का जीरा और दवाई के 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। चार चैंबर वाले केज निर्माण में छह लाख रुपए की लागत आती है। केज पानी में फ्लोट करता है। इसमें जीरा डालकर उसे फीड दिया जाता है। हजारीबाग में 550 से अधिक केज बना है। हजारीबाग जिला में तिलैया डैम क्षेत्र के पडरिया, कोयली, बेंदगी, माधोपुर, बरसोत, कोनार डैम क्षेत्र के गोविंदपुर, जमनीजारा, डुमरडीहा, हरियाडीह, जरहिया, जमुनिया डैम सहित अन्य जलाशय में केज फिश फार्मिंग हो रहा है। गिद्दी में कोल माइनिंग के बाद छोड़ दिए माइनिंग पीट में पानी जमा हो गया। उसमें भी मछली पालन किया जा रहा है। लगभग साल भर पानी रहनेवाले तालाबों में परंपरागत मछली पालन किया जाता है। इनकी खपत स्थानीय स्तर पर है। केज कल्चर से उत्पादित लगभग 90 मछली हजारीबाग से बाहर बिहार, उत्तर प्रदेश में बिकता है। जिला मत्स्य पदाधिकारी बताते हैं कि केज में मुख्य रूप से तेलापिया और पंगेसीयस का पालन किया जाता है। कतला, पबदा और अमूर कार्प का पालन प्रायोगिक तौर पर शुरू हुआ है। हजारीबाग जिले में मछली के बेहतर उत्पादन को जानने समझने के लिए हिमाचल प्रदेश के मत्स्य निदेशक, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा में मछली पालन से जुड़े लोग जनवरी में हजारीबाग आए थे। हम आत्मनिर्भर हैं स्थानीय लोग रोहू, कतला, मृगल, पहाड़ी प्रजाति की मछलियों से भली भांति परिचित है। इनकी डिमांड भी है। उसी की भरपाई बंगाल और आंध्र प्रदेश से आने वाली मछलियों से होता है। प्रदीप कुमार सिंह बताते हैं कि मछली के मामले में हजारीबाग आत्मनिर्भर है, लेकिन यहां की मछलियां दूसरे राज्यों में जाती हैं, जिसके कारण आंध्र प्रदेश और बंगाल की मछलियां बिक रही हैं। तिलापिया और पंगेसियस मछली। बरही के केज चारा डालता मत्स्य पालक।

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