परतों में छिपा जमीन का खेल: नाम बदलकर खरीदी कृषि भूमि, फर्म-कंपनी बनाकर कॉलोनी काटने वाले थे

कृषि भूमि को पहले कथित तौर पर अलग-अलग नामों से खरीदना, फिर उन्हें पार्टनरशिप फर्मों में ट्रांसफर करना, उसके बाद कंपनी संरचना बनाकर आवासीय कॉलोनी विकसित करने की तैयारी। यह पूरा खेल परत-दर-परत रचा गया। आयकर विभाग की बेनामी निषेध इकाई ने इस कथित नेटवर्क की कड़ियां जोड़ते हुए अब तक करीब 140 बीघा जमीन को अंतरिम तौर पर जब्त कर लिया है। जब्त संपत्तियों की डीएलसी दर लगभग 75 करोड़ रुपए आंकी गई है, जबकि बाजार मूल्य 200 करोड़ रुपए से अधिक बताया जा रहा है। संबंधित संचालकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। जांच में डेयरी व्यवसाय से जुड़े अशोक कुमार मोदी और उनके सहयोगियों के नाम सामने आए हैं। आरोप है कि वर्षों पहले कृषि जमीनें बेनामी नामों से खरीदी गईं। बाद में उन्हीं नामों को आधार बनाकर पार्टनरशिप फर्में गठित की गईं और भूमि का स्वामित्व फर्मों में स्थानांतरित किया गया। अगला चरण कंपनी गठन का था, जिसके जरिए रेजीडेंशियल कॉलोनी विकसित करने की तैयारी की जा रही थी। बताया जा रहा है कि इस पूरी संरचना के जरिए वास्तविक लाभार्थियों की पहचान छिपाने की कोशिश की गई। उदासर स्थित 23.5 बीघा भूमि, जिसकी डीएलसी कीमत करीब 50 करोड़ रुपए और बाजार मूल्य 100 करोड़ रुपए से अधिक बताया जा रहा है, को अंतरिम जब्ती में लिया गया है। इसके अलावा शिवबाड़ी क्षेत्र में आवासन मंडल को समर्पित 115 बीघा भूमि को भी बेनामी मानते हुए कार्रवाई की गई है। इस परियोजना में विकसित हिस्से का 25 प्रतिशत भाग संबंधित पक्षों को मिलने की शर्त सामने आई है। इस भूमि का बाजार मूल्य भी 100 करोड़ रुपए से अधिक आंका जा रहा है। कुछ जमीनें एससी-एसटी श्रेणी के नामों से खरीदी गईं, जिससे वैधानिक जटिलताओं से बचते हुए नियंत्रण बनाए रखा जा सके। बाद में इन्हीं नामों से बनी फर्मों के जरिए कई संपत्ति लेनदेन किए गए। जांच एजेंसी अब बैंकिंग ट्रेल, फर्म रजिस्ट्रेशन दस्तावेज, शेयर होल्डिंग पैटर्न और स्वामित्व हस्तांतरण की श्रृंखला की गहन पड़ताल कर रही है। इस नेटवर्क की निगरानी लंबे समय से की जा रही थी। प्रारंभिक सूचना के बाद वित्तीय लेनदेन और भूमि अभिलेखों का मिलान किया गया, जिसके बाद अंतरिम जब्ती की कार्रवाई की गई। हालांकि आयकर विभाग के अधिकारियों ने आधिकारिक टिप्पणी से इनकार किया है, लेकिन दस्तावेजों की पड़ताल तेज कर दी गई है। 140 बीघा बेनामी जमीन अंतरिम जब्त; 75 करोड़ डीएलसी, 200 करोड़ से ज्यादा बाजार मूल्य, आयकर की जांच तेज जांच में सामने आया कि जमीन सीधे अंतिम लाभार्थी के नाम पर नहीं थी। पहली परत में व्यक्तिगत खरीदार, दूसरी परत में पार्टनरशिप फर्म और तीसरी परत में कंपनी संरचना बनाई गई। इससे संपत्ति का वास्तविक नियंत्रण छिपा रहा, जबकि कागजों में स्वामित्व अलग-अलग संस्थाओं के पास दिखाई देता रहा। कुछ भूखंडों का हिस्सा सरकारी अधिग्रहण योजनाओं के लिए समर्पित कर परियोजना को वैधता का आवरण देने की रणनीति भी अपनाई गई। जांच एजेंसी अब यह देख रही है कि फर्मों के बीच हुए लेनदेन का वास्तविक वित्तीय स्रोत क्या था और लाभ का प्रवाह किन खातों तक पहुंचा। यदि दस्तावेजों और बैंक रिकॉर्ड में विसंगति सिद्ध होती है, तो अंतिम कुर्की और दंडात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। बेनामी निषेध इकाई का दायरा और अधिकार बेनामी निषेध इकाई आयकर विभाग की विशेष शाखा है, जो बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम के तहत कार्य करती है। इसका उद्देश्य उन संपत्तियों की पहचान करना है, जिनका वास्तविक लाभार्थी कोई और होता है, लेकिन संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति या संस्था के नाम दर्ज होती है। इस इकाई को संदिग्ध संपत्तियों की जांच, अंतरिम जब्ती, कारण बताओ नोटिस जारी करने और आवश्यक होने पर अंतिम जब्ती की अनुशंसा करने का अधिकार है। जांच में आय स्रोत, बैंकिंग लेनदेन, संपत्ति हस्तांतरण और फर्म/कंपनी संरचना का विश्लेषण किया जाता है। दोष सिद्ध होने पर संपत्ति सरकार के अधीन जा सकती है और संबंधित व्यक्तियों पर जुर्माना तथा अन्य दंडात्मक कार्रवाई संभव है। फिलहाल बीकानेर में हुई यह कार्रवाई बड़े बेनामी नेटवर्क की ओर संकेत कर रही है। विभाग की नजरें अन्य संभावित संपत्तियों पर भी टिकी हैं। आने वाले दिनों में जांच के नए आयाम सामने आ सकते हैं, जिससे इस जमीन खेल की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

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