भास्कर न्यूज | कवर्धा सात लाख रुपए के इनामी नक्सली दंपती रमेश उर्फ आटम गुड्डू और सविता उर्फ लच्छी पोयम ने 24 अप्रैल को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। छत्तीसगढ़ सरकार की नई आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर दोनों ने समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया। रमेश पर 5 लाख और सविता पर 2 लाख रुपए का इनाम था। रमेश (29) एमएमसी जोन के जीआरबी डिवीजन कमेटी के प्लाटून नंबर 01 का सक्रिय सदस्य था। सविता (21) टांडा एरिया कमेटी की सदस्य थी। दोनों पिछले 8 साल से एमएमसी क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों में शामिल थे। एसपी धर्मेंद्र छवाई ने बताया कि दोनों को 25-25 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि दी गई। कुल 50 हजार रुपए नकद दिए गए। शासन की नीति के अनुसार अन्य सुविधाएं जल्द दी जाएंगी। जिले में अब तक 11 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इनमें 10 इनामी नक्सली हैं। बकोदा की मुठभेड़ में हुए थे घायल सुपखार में छिपकर इलाज कराया था रमेश सुकमा जिले के चिन्नाबोरके गांव का रहने वाला है। वह करीब 10 साल से नक्सल संगठनों में सक्रिय रहा। सविता, बीजापुर जिले के पीटेपा गांव की रहने वाली है। 2017 में एमएमसी जोन बनने के बाद रमेश, स्टेट जोनल कमेटी के सदस्य पहाड़ सिंह का गनमैन बनकर जिले में आया था। 2018 में पहाड़ सिंह ने सरेंडर कर दिया। रमेश जीआरबी डिवीजन के प्लाटून 1 में सक्रिय रहा। मार्च 2019 में बकोदा जंगल में मुठभेड़ हुई थी। इसमें रमेश और प्रदीप घायल हुए थे। प्रदीप, नक्सली कमांडर दीपक तेलमुमडे का गार्ड था। रमेश के कंधे को छूकर गोली निकली थी। तब घायलों ने सुपखार के जंगल में छिपकर इलाज कराया। जिला नक्सल मुक्त, बॉर्डर पर रखी जा रही नजर: एसपी एसपी ने धर्मेंद्र ने बताया कि जिला नक्सल मुक्त घोषित किया गया है। लेकिन जिले की सीमावर्ती क्षेत्र नक्सली प्रभावित है। जहां नक्सली घटनाएं हो रही है। मंडला, बालाघाट सहित अन्य इलाकों पर अभी भी नक्सलियों की मूवमेंट है। जो कि जिले से लगा हुआ है। सरेंडर किए नक्सली भी इन्ही क्षेत्रों में सक्रिय रहे। रमेश के पास 12 बोर की बंदूक और सविता के पास 8 एमएम रायफल थी। दोनों 2017 से एमएमसी जोन में सक्रिय थे। नजदीकी बढ़ने पर फरवरी 2022 में दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद नक्सलियों के बड़े कमांडर, रमेश की नसबंदी कराना चाहते थे। ताकि दोनों संगठन छोड़कर न जा सकें। लेकिन दोनों परिवार बढ़ाने का मन बना चुके थे। इस बीच जिले में पुलिस के बढ़ते दबाव के कारण नसबंदी नहीं हो पाई। मार्च 2023 में दोनों किसी तरह संगठन छोड़कर गांव लौटे। संगठन छोड़ने से पहले किसी को शक न हो, इसलिए दोनों न नक्सली वर्दी, रायफल सहित अन्य सामान अपने कैंप में छोड़कर निकले। दोनों ने संगठन के अंदरूनी संघर्ष, अमानवीय व्यवहार, आदिवासियों पर अत्याचार और जंगल की कठिन जिंदगी से तंग आकर आत्मसमर्पण का निर्णय लिया। गौरतलब है कि सरेंडर को लेकर शासन की विभिन्न योजनाओं का असर दिखने लगा है।


