ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने वार्ड-66 में पिपरोली की जमीन को लेकर दायर की गई राज्य शासन की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड में हुई किसी एंट्री के बारे में पता चलता है कि वह फर्जी है तो राज्य शासन को संबंधित अधिकारी के खिलाफ आपराधिक या विभागीय कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसा न करके केवल अदालत में उसे फर्जी बताना राज्य को नैतिक अधिकार नहीं देता है। कोर्ट बोला- राजस्व अभिलेख हमेशा राज्य शासन के पास ही
सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि राजस्व अभिलेख हमेशा राज्य शासन के ही अधिकारियों के पास रहते हैं। साथ ही इसमें प्रविष्टियां भी उन्हीं के द्वारा की जाती हैं। यदि किसी पटवारी या तहसीलदार ने कानून के विरुद्ध प्रविष्टि की है और राज्य सरकार उसे जाली मानती है, तो फिर उस अधिकारी के खिलाफ आपराधिक व सेवा नियमों के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यह राज्य पर निर्भर है कि वह ऐसे अधिकारियों को बढ़ावा देना चाहते हैं या सरकारी भूमि की वास्तविक सुरक्षा। 160 दिन की देरी माफ की पर मेरिट पर याचिका की खारिज
दरअसल राज्य शासन ने 12 दिसंबर 2024 को एकल पीठ में सेकेंड अपील में दिए आदेश पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की। कोर्ट ने 160 दिन की देरी को माफ कर दिया, लेकिन मेरिट पर याचिका स्वीकार नहीं की। राज्य शासन की ओर से तर्क दिया कि पहले के निर्णय में जिन राजस्व प्रविष्टियों पर भरोसा किया गया, वे जाली थीं और कानून के अनुरूप नहीं बनाई गई थीं। ऐसे समझें मामला
उत्तम सिंह ने दावा किया वर्ष 1946 में तत्कालीन जमींदार बद्री प्रसाद द्वारा पट्टा दिया था। तभी से वह विवादित भूमि पर कानूनी रूप से कब्जे में है। राजस्व रिकॉर्ड में भी उसका नाम दर्ज रहा, लेकिन बाद में बिना सुनवाई के जमीन को सरकारी भूमि के रूप में दर्ज कर दिया गया। राज्य के अधिकारी उसे बेदखल करने की धमकी दे रहे थे। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 2014 उत्तम सिंह का दावा खारिज कर दिया। अपील कोर्ट ने 2018 में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए उत्तम सिंह को भूमि का वैध मालिक माना। अपील कोर्ट के खिलाफ राज्य शासन ने सेकेंड अपील दायर की। हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2024 को राज्य शासन की सेकेंड अपील खारिज की। 12 दिसंबर 2024 के आदेश में पुनर्विचार के लिए दायर याचिका को भी खारिज कर दिया। अब शासन के पास सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी का विकल्प सुरक्षित है।


