रांची यूनिवर्सिटी में सोशल साइंस के अंतर्गत के आने वाले विषयों के 220 प्रस्तावों को सुधार के साथ रिसर्च की अनुमति प्रदान कर दी गई। इसमें एंथ्रोपोलॉजी, साइकोलॉजी, सोशियोलॉजी, साइकोलॉजी, भूगोल, इतिहास फिलॉस्फी, इकोनॉमिक्स के रिसर्च प्रस्ताव हैं। शनिवार को वीसी डॉ. अजीत कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में सोशल साइंस रिसर्च काउंसिल की बैठक हुई, जिसमें संशोधन-सुधार के साथ प्राप्त प्रस्तावों को स्वीकृति दे गई। रिसर्च काउंसिल की बैठक के दौरान जानकारी मिली कि पीएचडी शोध को लेकर पीजी विभागों में एकरुपता नहीं है। एकरुपता लाने के लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रेसिड्योर) जारी किया जाएगा। ताकि सभी विभागों के बीच रिसर्च को लेकर एकरुपता बनी रहे। साथ ही रिसर्च में क्वालिटी का ध्यान रखने के लिए कहा गया है। बैठक में वीसी डॉ. अजीत सिन्हा के अलावा, रजिस्ट्रार डॉ. गुरुचरण साहू, डिप्टी रजिस्ट्रार डॉ. प्रीतम , सोशल साइंस डीन डॉ. पारस चौधरी समेत विभिन्न विभागों के एचओडी और रिसर्च काउंसिल के सदस्य थे। पीएचडी कोर्स वर्क में एडमिशन को लेकर भी पीजी विभागों के बीच एकरुपता नहीं है। किसी विभाग में पीएचडी प्री सेमिनार से पहले कोर्स वर्क में एडमिशन लिया जा रहा है। जबकि किसी विभाग में पीएचडी प्री सेमिनार के बाद कोर्स में एडमिशन लिया जा रहा है। नियमानुसार पीएचडी प्री सेमिनार के बाद ही संबंधित अभ्यर्थी का कोर्स वर्क में एडमिशन लिया जाना चाहिए। डिपार्टमेंट रिसर्च काउंसिल (डीआरसी) का नियमानुसार दो वर्ष में री-स्ट्रक्चर होना चाहिए। लेकिन कई विभागों में समय पर डीआरसी री-स्ट्रक्चर नहीं किया जाता है। उदाहरण स्वरुप में पीजी सोशियोलॉजी विभाग में डॉ. विनोद नारायण एसोसिएट प्रो. हैं। इसके बाद भी डिपार्टमेंट रिसर्च काउंसिल का सदस्य नहीं है।पीजी के अधिकांश विभागों में रिसर्च स्कॉलरों द्वारा डिपार्टमेंट रिसर्च काउंसिल में रिसर्च का वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन जमा नहीं किया जाता है। रिसर्च स्कॉलर का वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन हर हाल में जमा करने का निर्देश दिया गया। इससे शोध की गुणवत्ता बनी रहेगी। कोर्स वर्क में भी नहीं है समानता


