नाला|मालंचा में 21 और 22 जनवरी को होने वाले मेले के सफल संचालन को लेकर सोमवार को मेला कमेटी की बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता आशीष तिवारी ने की। इस बैठक में आगामी मेले के आयोजन और संचालन के लिए विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा की गई। मालूम हो कि हर साल 21 और 22 जनवरी, बंगला 7 और 8 माघ को मालंचा मंदिर परिसर में यह भव्य मेला आयोजित किया जाता है। यह मेला मां मालंचा देवी की पूजा के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाता है, जो प्राचीन काल से मालंचा पहाड़ की तलहटी में विराजमान हैं। इस अवसर पर दूर-दराज से श्रद्धालु और भक्तजन मां के दरबार में पूजा-अर्चना करने आते हैं और मेला का आनंद लेते हैं। बैठक में पंडाल निर्माण, लाइटिंग, साइकिल और मोटरसाइकिल स्टैंड, तथा विभिन्न दुकान और प्रतिष्ठानों को सुव्यवस्थित ढंग से व्यवस्थित करने के लिए सभी वॉलंटियर्स और समिति के सदस्यों को कार्य सौंपा गया। इस बैठक में मुख्य रूप से कांति दास, मनोज माजी, नदिया नंद दास, गोपी बल्लभ दास, शक्ति लया, रूपलाल गोरांई, संजय बाउरी, रंजीत तिवारी, छोटन तिवारी, तापस दास, गौतम लायक, कृष्ण लया, विजय लया, अमृत गोरांई, निर्मल कोल, सुरेश लोहार, विश्वनाथ दास, बिशु सिंह, सुबोध मंडल, गौतम मंडल समेत अन्य सदस्य उपस्थित थे। नारायणपुर|पूस मास पूर्णिमा के अवसर पर प्रखंड के कई मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ देखी गई। लोगों ने जगह जगह स्थित देवस्थलों में जाकर इस अवसर पर पूजा अर्चना की। पूर्णिमा के अवसर पर करमदाहा स्थित दुखिया बाबा मंदिर में काफी संख्या में लोगों ने इस अवसर पर पूजा की। बराकर नदी में स्नान कर श्रद्धालुओं ने बाबा मंदिर में जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की। पबिया|मकर संक्रांति के साथ-साथ इस समय सोहराय पर्व भी बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। उदयपुर गांव में सामूहिक नृत्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया, और इस साथ ही पांच दिवसीय सोहराय पर्व अपने समापन की ओर बढ़ रहा है। ग्रामीण नरेश किस्कू, राजेश सोरेन, शिवुधन सहित अन्य ग्रामीणों ने बताया कि मकर संक्रांति के दिन मंगलवार को सभी ग्रामीण एक साथ शिकार पर निकलेंगे, जो कि इस पर्व की एक पुरानी परंपरा है। इस दिन लोग विभिन्न प्रकार के शिकार खेलते हैं और शिकार के साथ सोहराय पर्व का समापन होता है। सोहराय पर्व के चौथे दिन, सोमवार को गांव में खास आयोजन हुए। ग्रामीणों ने खूंटा उपड़ा मनाया, जिसे स्थानीय भाषा में जाले कहा जाता है। इस दिन सुबह से ही गांव में नाच-गान की धूम मच गई, जो देर रात तक जारी रही। ग्रामीण एकत्र होकर सोहराय पर्व को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। नृत्य कार्यक्रम में लोग पारंपरिक यंत्रों की ध्वनि के साथ अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। गांव में मेहमानों का आना-जाना भी रहा। लोग अपने मित्रों और रिश्तेदारों को दावत देने के लिए एक दूसरे के घर गए। इस परंपरा से समाज में आपसी भाईचारे और एकता को प्रोत्साहन मिलता है। सोहराय पर्व के इस आयोजन से ग्रामीणों में अपार उल्लास और उत्साह देखा जा रहा है, जो इस त्योहार को और भी खास बनाता है।


