करीब 3500 करोड़ रुपए के भारी-भरकम बजट वाले पेयजल विभाग के पास वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के ऑपरेशन-मेंटेनेंस (ओएनएम) तक के पैसे नहीं हैं। इससे ग्रामीण और शहरी जलापूर्ति योजनाओं के ऑपरेशन-मेंटेनेंट और जलापूर्ति तक पर संकट खड़ा हो गया है। इस हालात को देखते हुए अब पेयजल विभाग ने पिछले वित्तीय वर्ष में 31 मार्च को सरेंडर की गई 290 करोड़ रुपए की राशि सरकार से मांगी है। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव एमएस मीणा ने इस संबंध में मुख्य सचिव अलका तिवारी और वित्त सचिव से बात की है। इसके बाद वित्त विभाग को पैसे लौटाने का प्रस्ताव भेजा है। विभाग का मानना है कि इस राशि के मिलने से कुछ राहत मिल सकती है। गौरतलब है कि करीब चार साल पहले भुगतान न होने से रांची के रुक्का ट्रीटमेंट प्लांट चला रही एजेंसी के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। इससे पानी की आपूर्ति ठप हो गई थी। विभाग ने अगले दिन कुछ पैसों का इंतजाम कर एजेंसी को भुगतान किया। इसके बाद अगले दिन राजधानी में जलापूर्ति सुचारू हो पाई। इस बार भी ऐसी ही स्थिति बन रही है। बजट: 4 माह बाद भी नहीं मिले पैसे झारखंड का बजट मार्च में पास हो गया। लेकिन पेयजल विभाग को बजट की राशि अब तक हस्तांतरित नहीं की गई है। इससे ऐसे हालात बन गए हैं। विभाग का कहना है कि अगर बजट के पैसे जल्दी मिल जाएं तो इससे काम आसान हो जाएगा। सभी व्यवस्था सुचारू हो जाएंगी। लेकिन जब तक बजट की राशि नहीं मिलती, तब तक सरेंडर की गई राशि ही मिल जाए तो कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। ऑपरेशन-मेंटेनेंस में होते हैं ये काम विभिन्न जलापूर्ति योजनाओं के लिए अलग-अलग वाटर ट्रीटमेंट प्लांट हैं। यहां पानी का ट्रीटमेंट कर उसे पाइप लाइन के जरिए सप्लाई की जाती है। इसके अलावा जलापूर्ति पाइप लाइन की मरम्मत और खराब चापाकलों की मरम्मत कार्य भी इसी के अधीन आता है। इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग एजेंसियां बहाल की गई हैं। लेकिन एजेंसियों को भुगतान न होने से इसके संचालन में दिक्कत आ रही है। इस महीने बजट के पैसे मिलने की उम्मीद : मंत्री बजट के पैसे आने में देरी के कारण सरेंडर की गई राशि मांगी गई है। चूंकि वह मेरे विभाग के पैसे हैं, इसलिए लौटाने की मांग की गई है। इसके साथ ही बजट के पैसे भी मिल जाएं तो सारी व्यवस्थाएं सुचारू हो जाएंगी। उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक बजट के पैसे भी मिल जाएंगे। फिर कोई दिक्कत नहीं होगी। -योगेंद्र प्रसाद, मंत्री पीएचईडी जलापूर्ति योजनाओं का संचालन कर रहीं एजेंसियों को पिछले छह महीने से भुगतान नहीं किया गया है। इससे रांची के रुक्का, हटिया और गोंदा वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से जलापूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है। इसके अलावा धनबाद के सिंगल व क्लस्टर विलेज जलापूर्ति योजना ओर बलियापुर ग्रामीण जलापूर्ति योजना का भी मेंटेनेंस नहीं हो पा रहा है। इसी तरह जमशेदपुर के आदित्यपुर शहरी जलापूर्ति योजना, बेंगाबाद, गिरिडीह व तेनुघाट समेत करीब 15 योजनाओं पर इसका असर पड़ रहा है। चालू वित्त वर्ष में हर पंचायत के लिए 10-10 चापानल आवंटित हुआ है। अब इसकी मरम्मत और पूरी तरह खराब हो चुके चापानल की जगह दूसरा चापानल लगाने के लिए डीएमएफटी का इस्तेमाल किया जा रहा है।


