भास्कर न्यूज| राजनांदगांव जैन बगीचे स्थित उपाश्रय भवन में जारी नियमित प्रवचन में शनिवार को मुनि वीरभद्र (विराग) श्रीजी ने कहा कि आध्यात्म की शुरुआत परोपकार से होती है और इसका अंत भी परोपकार से होता है। दरअसल परोपकार से आत्मा की संरक्षा का मार्ग प्रशस्त होता है। कहा कि परोपकार पर अर्थात दूसरों का उपकार नहीं बल्कि स्वयं का उपकार होता है। व्यक्ति दोषी नहीं होता बल्कि उसका आचार, व्यवहार, राग दोषी होता है। आचार-व्यवहार को बदला जा सकता है। व्यक्ति को बदला जा सकता है। उन्होंने कहा कि जिसके अंदर परमार्थ आ जाए, त्याग का भाव आ जाए वह परोपकारी है। जो भी व्यक्ति चारित्र लेना चाहता हो, उसका सहयोग करना परोपकार की पराकाष्ठा है। परोपकार से आत्मा की सुरक्षा और संरक्षा का मार्ग तैयार होता है। सच्चा डॉक्टर रोगी के रोग को देखता है, व्यक्ति को नहीं। कहा कि सम्यक धारणा यदि मन में बन गई तो फिर वह व्यक्ति परोपकार का कोई मौका नहीं छोड़ सकता। स्वयं के स्वार्थ को छोड़कर यदि कोई दूसरे का हित कर रहा हो तो वह परोपकार है। हमें स्वार्थ त्यागकर किसी की मदद करनी चाहिए ना कि स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी की मदद करनी चाहिए। बड़ा परोपकार भूखे को भोजन देना है परमार्थ तत्वों को यदि गहराई से समझे तो कांसेप्ट क्लीयर हो जाएगा और आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़ पाएंगे। परोपकार महत्व और प्राथमिकता के बारे में बताते हुए कहा कि किसी अभावग्रस्त व्यक्ति को यदि हम कपड़े दे देते हैं तो वह कम परोपकार है, उससे बड़ा परोपकार भूखे को भोजन देना होता है। कहा कि व्यक्ति बिना कपड़े के रह सकता है लेकिन भूखा नहीं रह सकता। यदि व्यक्ति को कोई दूसरा व्यक्ति आत्म कल्याण के मार्ग पर ले जाता है तो यह सर्वोत्कृष्ट परोपकार है। द्रव्य परोपकार, भाव परोपकार का कारण बनता है।


