प्री-मैच्योर बच्चों में अंधेपन का खतरा, समय पर जांच जरूरी

समय से पहले पैदा होने वाले प्री-मैच्योर बच्चों में रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी(आरओपी) एक गंभीर और अहम समस्या है। एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर समय पर बच्चों की जांच और इलाज न हो तो जिंदगी भर अंधेपन का शिकार होना पड़ सकता है। कई रिसर्च रिपोर्ट्स के अनुसार 34 हफ्ते से कम या जन्म के समय 1750 ग्राम से कम भार वाले बच्चे इस समस्या के शिकार ज्यादा पाए गए हैं। हालांकि कई केस में 34-36 हफ्ते और 1750 से लेकर 2000 ग्राम भार के बच्चों में भी यह समस्या देखने को मिल चुकी है। ऐसे में प्री-मैच्योर बच्चों की समय पर आरओपी की स्क्रीनिंग और इलाज जरूरी है जिससे भविष्य में उन्हें अंधेपन से बचाया जा सके। प्री-मैच्योर पैदा होने वाले 20 फीसदी तक मामलों में आरओपी की समस्या पाई जाती है। समय पर इलाज से अंधेपन से बचें केस-1: जन्म के समय बच्चा प्री-मैच्योर और 1.34 किलो का था। जिस पर उसकी जांच की सलाह दी गई। स्क्रीनिंग के बाद पता चला कि आरओपी की समस्या है। ऐसे में एक्सपर्ट्स द्वारा लेजर की सलाह दी गई। पहले पेरेंट्स द्वारा डर और चिंता जताई गई। जिस पर उनकी काउंसलिंग के बाद समय पर इलाज से भविष्य के अंधेपन से बचने की जानकारी दी गई। बच्चे की सर्जरी की गई और अब वो स्वस्थ है। केस-2: आईसीयू में रहा बच्चा, अब स्वस्थ जन्म के समय में बच्चा प्री-मैच्योर था जिस पर उसे नियोनेटल आईसीयू में रखा गया था। आंखों की जांच के बाद जानकारी हुई कि आरओपी की भी समस्या है। जिस पर बच्चे का इलाज किया गया और अब वह पूरी तरह से स्वस्थ है और पांच साल का भी हो चुका है।

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