खंडवा में बेशकीमती जमीन हथियाने के लिए फर्जीवाड़े का अनोखा मामला सामने आया है। ओंकारेश्वर रोड स्थित एक जमीन पर दावा जताने के लिए कुछ लोगों ने ग्राम पंचायत से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वारसान प्रमाण-पत्र बनवा लिया। हैरानी की बात यह है कि इसी प्रमाण-पत्र के आधार पर पुनासा एसडीएम ने 17 साल पहले बिक चुकी जमीन पर स्टे (स्थगन) भी दे दिया। परेशान जमीन मालिक ने अब कलेक्टर ऋषव गुप्ता से शिकायत की है। मांधाता राजपरिवार की थी जमीन, 2008 में हुई थी रजिस्ट्री पुनासा तहसील के भोगावां (इनपुन) गांव का यह मामला है। यह जमीन 1925 से 1991 तक मांधाता राजपरिवार की थी। 1992 में यह भोगावां निवासी दयाराम (पिता पदम) के नाम हुई। 1997 में दयाराम की मृत्यु हो गई और उनका कोई वारिस नहीं था। 2003 में प्रशासन ने यह जमीन गांव के गरीब सुखराम (पिता गोपीचंद) को दे दी। 2008 में सुखराम ने यह जमीन सनावद निवासी ललित अवासे को बेच दी। पिछले 17 साल से ललित के पास इसकी रजिस्ट्री और कब्जा है। कॉलोनी कट रही थी, तभी आ गया स्टे जमीन मालिक ललित अवासे ने हाल ही में कलेक्टर और टीएनसीपी से अनुमति लेकर वहां कॉलोनी का विकास कार्य शुरू किया था। इसी बीच भोगावां निवासी मरूबाई और अन्य ने खुद को 1997 में मृत हो चुके दयाराम का वारिस बताते हुए एसडीएम कोर्ट में आवेदन दिया। एसडीएम ने काम पर स्टे लगा दिया। नाम में खेल: पिता अलग, फिर भी बन गए वारिस ललित अवासे ने कलेक्टर को बताया कि जिस दयाराम के नाम जमीन थी, उनके पिता का नाम ‘पदम’ था। जबकि जिन लोगों (मरूबाई, रूखमाबाई, बस्करबाई आदि) ने वारसान बनवाया है, वे दयाराम (पिता जगराम) के वारिस हैं। नाम की समानता का फायदा उठाकर फर्जी शपथ-पत्र के जरिए पंचायत से सर्टिफिकेट हासिल किया गया और जमीन पर दावा ठोक दिया गया। सचिव बोले- शपथ-पत्र दिया था, हम बाध्य थे इस मामले में ग्राम पंचायत भोगावां के सचिव बलिराम बिरला का कहना है कि आवेदक ने स्टाम्प पर शपथ-पत्र दिया था और गांव के लोगों ने पंचनामा में उनके पक्ष में बयान दिए थे। समय-सीमा में वारसान प्रमाण-पत्र देने की बाध्यता के चलते हमने सर्टिफिकेट जारी कर दिया।


