फागुन मेले में जानवरों के शिकार का स्वांग रचकर आज से निभाएंगे परंपरा

भास्कर न्यूज | दंतेवाड़ा फागुन मेले की शुरुआत हो चुकी है अब अगले चार दिनों तक आखेट नृत्यों की परंपराओं का निर्वहन होगा जिसके तहत लम्हामार, कोडरीमार, चीतलमार एवं गंवरमार का प्रदर्शन किया जाएगा जो कि क्रमश: खरगोश, कोतरी, चीतल तथा गौर के शिकार पर आधारित आखेट नृत्य हैं। इन नृत्यों में जानवरों का स्वांग रचा जाएगा जिसके लिये तूम्बे से बने मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। फागुन मंडई में निभाये जाने वाले आखेट नृत्यों में सर्वाधिक लोकप्रिय गंवरमार को कहा जा सकता है जिसे देखने के लिये बड़ी संख्या में दर्शनार्थी जमा होते हैं। गंवरमार नृत्य में गंवर (वन भैंसा) का प्रतीकात्मक शिकार किया जाता है। परंपरानुसार इसमंे एक पात्र गंवर का स्वांग रचता है व उसका अभिनय करते हुए वह शिकार के वातावरण को निर्मित कर देता है। अब इस गंवर को हाका लगाकर घेरा जाता है। स्वांग के अनुसार शिकार होने से बचने के लिये गंवर छिप जाता है। किसी सयान के इशारे पर जिस पर देवी की कृपा हो गंवर को तलाश लिया जाता है तथा इसके साथ ही मंदिर के पुजारी द्वारा फायर कर गंवर का प्रतीकात्मक शिकार किया जाता है। आखेट जनजातीय समाज का अभिन्न हिस्सा है तथा नृत्य परंपराओं में इसका प्रदर्शन फागुन मडई के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। पूरी रात चलने वाले इन आखेट नृत्यों को बहुतायत संख्या में लोग देखने पहुंचते हैं। गंवरमार प्रथा के दूसरे दिन अर्थात त्रयोदशी को उत्सव पूर्वक मड़ई आयोजित की जाती है। इस दौरान मांईजी के छत्र के साथ दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी को पालकी में बिठाकर नगर का भ्रमण कराया जाता है। इस परिभ्रमण में छत्र, सैकड़ों देवी-देवताओं के देवलाट आदि के साथ-साथ बहुत बडी संख्या में ग्रामीण भी सम्मिलित होते हैं। अगले आयोजन के रूप में आंवरामार का आयोजन उल्लेखनीय है। इस दिन प्रथमत: दंतेश्वरी की पालकी में आंवला फल अर्पित किया जाता है जिसके पश्चात पुजारी, सेवादार, बारह-लंकवार व जनसामान्य दो समूहों में बंटकर एक-दूसरे पर इसी आंवले से प्रहार करते हैं।

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