इंस्टाग्राम-फेसबुक पर हजारों दोस्त होने के बावजूद लोग भीतर से अकेले पड़ते जा रहे हैं। वजह- डिजिटल आइसोलेशन – जहां बातचीत स्क्रीन तक सिमट गई है और आमने-सामने मिलने का चलन कम हो रहा है। खासकर युवा रील और पोस्ट की दुनिया में इतने उलझ गए हैं कि मुश्किल वक्त में बात करने वाला कोई नहीं बचता।
इसी खालीपन को भरने के लिए रायपुर में ‘हाई फाइव हब’ की शुरुआत हुई है। यह पहल युवाओं को मोबाइल से बाहर निकालकर फिर से लोगों से जोड़ने का काम कर रही है। कैफे और रेस्तरांं में आर्ट वर्कशॉप, ओपन माइक, गेम्स और भजन जैमिंग जैसे कार्यक्रमों के जरिए अनजान लोग एक-दूसरे से मिल रहे हैं। मकसद सोशल मीडिया पर हजारों फ्रेंड जोड़ने के बजाय रियल लाइफ कम्युनिटी बनाना है, ऐसी कम्युनिटी जो वक्त पड़ने पर साथ खड़ी हो। हाई फाइव हब के फाउंडर राहुल भोजवानी बताते हैं कि तीन महीने पहले इस आइडिया पर काम शुरू किया। पहला इवेंट 27 अगस्त को हुआ। इसमें 15-20 लोग पहुंचे, ज्यादातर अकेले। बातचीत हुई, हॉबी और काम के बारे में चर्चा हुई और पहली बार कई लोगों ने बिना जजमेंट के खुद को खुलकर रखा। हाल में हुए भजन जैमिंग कार्यक्रम में 150 से ज्यादा लोग शामिल हुए, जिनकी उम्र 18 से 55 साल के बीच रही। आर्ट क्राफ्ट, गेम्स के साथ भजन-कीर्तन से जोड़ रहे
पिछले वीकेंड पर हाई फाइव हब ने भजन जैमिंग का प्रोग्राम रखा। इसमें अधिकतर युवा शामिल रहे। अगल-बगल बैठा लगभग हर इंसान एक-दूसरे से अनजान रहा। घेरा बनाकर बैठे, खुद से सामने आकर अपने-अपने मनपसंद भजन गाए। बाकी लोग भी इनमें झूमते दिखे। बाद में बातचीत की और एक-दूसरे को जाना, साथ में खाया। कोई बोला ऑफिस में दिन, मोबाइल में रात बीती, किसी ने जताया नए लोगों से मिलने का डर
अंकित अग्रवाल (39): ‘दिनभर ऑफिस और रात को मोबाइल-यही मेरी लाइफ थी। शिवम पर लोग थे, लेकिन बात करने-समझने वाला कोई नहीं। स्क्रीन से निकलकर नए लोगों से मिलना, अलग अनुभव है।’ मुस्कान शर्मा (26): ‘पहली बार किसी अनजान ग्रुप में जाने का डर था, लेकिन यहां माहौल इतना कंफर्टेबल था। एक-दूसरे को जज किए बिना लोग घुल-मिल रहे थे।’ हफ्ते में 6 दिन जॉब और छुट्टी पर सोना, कोई नयापन नहीं अधिकतर लोग आज कॉरपोरेट कल्चर में ढल गए हैं। सोमवार-शनिवार जॉब और रविवार को छुट्टी पर सोना, घूमना या मूवी देखना। हर हफ्ते लोग यही रिपीट करते हैं। जिंदगी में कोई नयापन नहीं, कोई नई चीजें, कोई नया काम नहीं। यही वजह की लोग बोर हो चुके हैं और मानसिक थकान नहीं जा रही। इसीलिए हर रविवार को कोई नए तरह का प्रोग्राम ऑर्गनाइज कराते हैं। इससे लोगों में उत्साह बना रहता है। इस नए-पन की एक्साइटमेंट उन्हें पूरे हफ्ते चार्ज रखती है। बड़े शहरों की चकाचौंध में देखी कमी, यहीं से निकला आइडिया
चार्टर्ड अकाउंटेंट व फाउंडर राहुल भोजवानी ने बताया, ‘पुणे, गुरुग्राम और इंदौर में काम करते हुए महसूस किया कि सीख सिर्फ पढ़ाई और ऑफिस तक सीमित नहीं होती। ये लोगों से बातचीत और अनुभव साझा करने से भी मिलती है। कई शहरों के मीटिंग में हिस्सा लेते हुए ऐसी कमी दिखी, जहां लोग खुलकर जुड़ सकें। इसी जरूरत से हाई फाइव हब की शुरुआत हुई। मकसद- लोगों को मोबाइल स्क्रीन से बाहर निकालकर आमने-सामने जोड़ना है। मीटअप्स, कन्वर्सेशन सर्कल्स, म्यूजिक ईवनिंग्स और इंटरेस्ट आधारित गेदरिंग्स के जरिए यह कम्युनिटी लोगों को घुलने-मिलने में मदद कर रही है। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. ईला गुप्ता, मनोरोग विशेषज्ञ हर 6 में से एक इंसान अकेला, इससे डिप्रेशन और जान का खतरा बढ़ रहा
घर में खाने की टेबल में भी लोग आपस में बात करने की बजाय मोबाइल पर लगे हैं। घर से बाहर भी यही हाल है। इसी कारण मुश्किल समय में जब किसी से बात करने की जरूरत पड़ती है तो कर नहीं पाते। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के सोशल कनेक्शन कमीशन रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर 6 में से 1 व्यक्ति अकेलेपन जूझ रहा है। ये समस्या 13 से 29 साल के युवाओं में तेजी से बढ़ रही है। कमजोर सामाजिक रिश्ते मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक बीमारी और समय से पहले मृत्यु के जोखिम को बढ़ाते हैं। अकेलापन डिप्रेशन, चिंता और आत्महत्या के खतरे से जुड़ा पाया गया है।


