फोन नेटवर्क जाए, बैटरी खत्म होने पर घबराहट…नोमोफोबिया का संकेत

मोबाइल हर किसी की जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना कुछ लोगों को समय बिताना मुश्किल लगता है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो फोन के बिना खुद को अधूरा महसूस करने लगे हैं। मोबाइल एडिक्शन के शिकार लोग फोन का नेटवर्क चला जाए, बैटरी खत्म हो जाए या कुछ समय के लिए फोन उनसे दूर हो जाए, तो घबराने लगते हैं। इस स्थिति को नोमोफोबिया कहते हैं, जिसका मतलब है ‘नो मोबाइल फोन फोबिया’। ये एक मानसिक समस्या है, जिससे युवा ही नहीं, प्रोफेशनल्स भी प्रभावित हो रहे हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि अगर फोन के बिना बेचैनी, घबराहट या तनाव महसूस हो रहा है, तो यह नोमोफोबिया का संकेत हो सकता है। फोन का संतुलित उपयोग जरूरी हो जाएं सतर्क : रात में फोन के बिना नींद न आना दिनचर्या बनी {28 साल के एक प्रोफेशनल की सुबह उठते ही फोन चेक करना, काम के दौरान हर 10-15 मिनट में नोटिफिकेशन देखना और रात में फोन के बिना नींद न आना दिनचर्या बन चुकी थी। एक बार गलती से फोन घर पर छूट गया, तो ऑफिस में पूरा दिन बेचैनी में बीता। डिजिटल डिटॉक्स व फोन के सीमित उपयोग से राहत मिली। {बिना फोन के अकेलापन महसूस होने लगा: 20 साल की कॉलेज छात्रा को पढ़ाई के दौरान बार-बार फोन चेक करने की आदत लग गई। ऑनलाइन क्लासेज के बहाने पूरा दिन फोन पर लगी रहती। परिवार ने फोन सीमित करने की कोशिश की, तो उग्र होने लगी। बिना फोन के अकेलापन महसूस होने लगा था। {नोटिफिकेशन मिस होने का डर, नींद पर असर: 35 साल के बिजनेसमैन की जिंदगी बिजनेस कॉल्स और चैट्स में उलझ गई थी। ऑनलाइन बिजनेस भी था, इसलिए लगता था कि कोई नोटिफिकेशन मिस न हो जाए। लगातार बैटरी चार्ज रखने की आदत ने उनकी दिनचर्या भी बिगाड़ दी। इससे उनकी नींद प्रभावित होने लगी, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन रहने लगा। {एक दिन भी फोन के बिना गुजारना मुश्किल: 33 साल की एक हाउसवाइफ को सोशल मीडिया पर रील्स देखने की इतनी आदत हो गई थी कि घर के काम और परिवार पर ध्यान कम हो गया था। फोन की बैटरी खत्म होते ही वे बेचैन हो जाती और इंटरनेट पैक समय से पहले ही रिचार्ज करवा लेती थीं, क्योंकि एक भी दिन बिना मोबाइल के गुजारना मुश्किल था।

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