बचपन की स्मृतियां व मां के दुलार को चित्रित किया

भास्कर न्यूज| महासमुंद शरद पूर्णिमा के अवसर पर मंगलवार को आस्था साहित्य समिति महासमुंद के तत्वावधान में साहित्यकार डॉ. साधना कसार के निवास पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। सभी साहित्यकारों ने चांद की शीतल किरणों के ऊपर अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। इस अवसर पर उत्तरा विदानी ने चांद को रेखांकित करते हुए कहा कि आज महज तालियों के लिये कोई गीत नहीं गाऊंगी चंद्रमा, सुनना चहांगे तो झोपड़ी के विरुद्घ व्यथा सुनाऊंगी चन्द्रमा। साहित्यकार सरिता तिवारी ने कहा कि आज मेरी आवाज परेशान कर जाती है, कल मेरी खामोशी सताएगी। अध्यक्षीय आसंदी से काव्य कलश छलकाते हुए साहित्यकार आनंद तिवारी पौराणिक ने कहा कि रोटी ने नहीं पूछी, किसी भूखे की जात, व्यसन नहीं की कभी मजहब की बात- बढ़ती उम्र में भी साहित्य साधना में रत आशा मानव ने कहा कि चांद एक रुप है, रुप का प्रतीक है, पूर्ण मद का चन्द्र है इन्दू, चांद दृश्य रुप है ईश के स्वरुप का। साहित्यकार एस. चन्द्रसेन ने कहा कि आसमान में चांद चमकता चांदनियां भर आती है। उनसे लेकर कुंभ, कुंभ फिर शरद सुधा बरसाती है। बचपन की स्मृतियां व मां के दुलार पर शब्द चित्रित करते हुये डॉ. साधना कसार ने कहा कि कभी डांटना कभी समझाना मुझे बनाना मुझे संवारना क्या जीवन क्या जीवन भर भूल सकूंगी। शरद काव्य गोष्ठी में साहित्यकार टेकराम सेन चमक ने चमक बिखेरते हुए शरद के आगमन पर ग्रामीण परिवेश का चित्रण करते हुये कहा कि गोबर लिपा मेरा शरद का आंगन शरद के आंगन में प्रिया की रंगोली, प्रिया की रंगोली में दस-दस रंग, दस-दस रंगों में कातिक के फूल, फूलों भरा मेरा शरद का आंगन। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार आनंद तिवारी पौराणिक, आशा मानव, केआर. चंद्राकर सहित अन्य मौजूद थे।

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