बड़वानी में बुधवार को बड़ी संख्या में आदिवासी किसान-मजदूरों ने अपने सम्मान और अस्तित्व के अधिकार के लिए कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया। उन्होंने रोजगार, जमीन और नागरिकता पर कथित हमलों के खिलाफ राष्ट्रपति और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा। एसआईआर में गलत तरीके से नाम हटाने का लगाया आरोप आदिवासियों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण (एसआईआर) में उनके नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। हजारों आदिवासियों को अब नोटिस जारी कर नागरिकता का सबूत मांगा जा रहा है, जिससे उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। 261 रुपए देकर आदिवासियों से बेगारी करवाने का भी आरोप संगठन के हरसिंग जमरे ने बताया कि जहां हजारों आदिवासी पलायन को मजबूर हैं, वहीं रोजगार के साधन बढ़ाने के बजाय ‘विकसित भारत ग्राम जी’ कानून पारित कर रोजगार गारंटी को कमजोर किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार खुद 467 रुपए प्रतिदिन को न्यूनतम आवश्यकता मानती है, लेकिन नरेगा में इसका आधा, यानी 261 रुपए देकर आदिवासियों से बेगारी करवाई जा रही है। आदिवासियों का कहना है कि पिछले 10-15 सालों में किसी को भी 100 दिन का काम नहीं मिला, और अब 125 दिन का झूठा वादा किया जा रहा है। इस कानून में काम कहां और कब खुलेगा, यह तय करने का अधिकार शासन-प्रशासन के पास रखा गया है, जो पेसा कानून का उल्लंघन है। ग्राम सभा से काम तय करने का अधिकार छीन लिया गया है। बहाना बनाकर काम न देने जैसी समस्याओं का भी किया जिक्र उन्होंने फर्जी बिजली बिल वसूलने का भी आरोप लगाया, जिसमें बिना मीटर रीडिंग के किसानों से गेहूं सिंचाई के समय बिजली सप्लाई के बदले पैसे लिए जा रहे हैं। मोबाइल हाजिरी, जियो-टैगिंग और आधार-केवाईसी के जरिए मजदूरी और भुगतान रोकने तथा बजट न होने का बहाना बनाकर काम न देने जैसी समस्याओं का भी जिक्र किया गया। संगठन की ना बाई ने बताया कि जिन लोगों ने देश की आजादी और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सबसे पहले कुर्बानी दी, आज उन्हीं के बच्चों को रोजगार, दाम और पहचान से वंचित किया जा रहा है। जागृत आदिवासी दलित संगठन ने मध्य प्रदेश शासन-प्रशासन द्वारा एसआईआर में आदिवासियों और अन्य गरीबों के वोट के अधिकार छूटे जाने के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत भी दर्ज कराई है।


