बदल रही थाली : पब्लिक का अब ऑर्गेनिक की ओर रुख

भास्कर न्यूज | जालंधर ऑर्गेनिक मंडी में ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लोग अब केमिकल-मुक्त, शुद्ध और सुरक्षित भोजन की तलाश में हैं। इसी सोच को मजबूती दे रही है लाडोवाली रोड पर खेती भवन के प्रांगण में लगने वाली ऑर्गेनिक मंडी। खान-पान को लेकर लोगों की सोच में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। अब सब्ज़ी खरीदते समय केवल दाम ही मायने नहीं रखते, बल्कि यह सवाल भी अहम हो गया है कि सब्ज़ी कैसे उगाई गई है और उसमें कौन-कौन से पदार्थ इस्तेमाल किए गए हैं। दोआबा ऑर्गेनिक मंडी इसी बदलती हुई सोच की सजीव तस्वीर पेश करती है। इस साप्ताहिक मंडी की शुरुआत नवंबर 2023 में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने पंजाब एग्री एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन के सहयोग से की थी। यहां केवल प्रमाणित जैविक किसान ही अपने उत्पाद बेचते हैं, जिससे उपभोक्ताओं का भरोसा और भी मजबूत होता है। पिछले दो वर्षों में मंडी में आने वाले लोगों की संख्या के साथ-साथ उनका विश्वास भी लगातार बढ़ा है। स्वस्थ जीवनशैली की ओर बढ़ते कदमों का यह स्पष्ट संकेत है कि ऑर्गेनिक खेती और शुद्ध भोजन अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बनते जा रहे हैं। पिछले दो वर्षों में यहां आने वाले लोगों की संख्या और भरोसा-दोनों बढ़े हैं। जैविक भोजन से सेहत में सुधार मंडी में अपनी बेटी के साथ आई एक महिला बताती हैं कि वे पिछले दो साल से यहीं से जैविक सब्जियां और अन्य उत्पाद ले रही हैं। उनके पति को लीवर से जुड़ी परेशानी थी। डॉक्टरों की सलाह पर खान-पान बदला गया। जैविक भोजन अपनाने के बाद उनकी सेहत में सुधार देखने को मिला। स्वाद और ताजगी में फर्क… सन्नी बताते हैं कि वे करीब एक साल पहले दोआबा ऑर्गेनिक मंडी का इश्तेहार देखकर पहली बार यहां आए थे। शुरुआत केवल अजमाने के लिए की थी। स्वाद और ताज़गी में फर्क महसूस हुआ, इसके बाद वे नियमित रूप से यहीं से सब्जियां और अन्य उत्पाद लेने लगे। कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए रसायन- मुक्त भोजन अधिक सुरक्षित माना जाता है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए अधिक सुरक्षित लंबे समय तक लाभ जैविक भोजन तुरंत असर दिखाने वाली दवा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खान-पान से बनने वाली दीर्घकालिक सुरक्षा है। सत्मिंदर सिंह ने वर्ष 2008 में जैविक खेती शुरू की। वे बताते हैं कि यह निर्णय आसान नहीं था। शुरुआत में पैदावार कम रही और बाजार को लेकर असमंजस भी था। परिवार में बीमारी के अनुभव ने उनकी सोच बदली। बहन को गर्भाशय का कैंसर होने के बाद उन्होंने रासायनिक खाद और कीटनाशकों वाले भोजन से दूरी बनाने का फैसला किया। इसी के साथ उन्होंने ठान लिया कि खुद भी जैविक खाएंगे और दूसरों तक भी वही पहुंचाएंगे।

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