खिलचीपुर के घने जंगलों में स्थित बराई माता मंदिर, आस्था का एक अनोखा केंद्र है। यह मंदिर किसी साधारण जगह पर नहीं, बल्कि लगभग 400 साल पुरानी रियासतकालीन बावड़ी के अंदर बना हुआ है। यहां, माता की प्रतिमा के साथ-साथ बावड़ी में जमे प्राचीन पत्थरों को भी चमत्कारी माना जाता है। मान्यता है कि इन पत्थरों से टूटकर गिरने वाले कंकर चेचक जैसे असाध्य रोग से मुक्ति दिलाते हैं। मंदिर में माता की प्रतिमा बावड़ी के बीच से निकली हुई है और नवरात्रि के दिनों में विशेष पूजा-पाठ और श्रृंगार किया जाता है। यहां के पत्थरों की अनोखी परंपरा है। माना जाता है कि चेचक होने पर, बावड़ी से टूटे हुए पांच कंकर उठाकर माता के सामने चढ़ाने और फिर उन्हें घर ले जाकर पानी में घिसकर चेहरे पर लगाने से रोग ठीक हो जाता है। राजस्थान तक से श्रद्धालु यहां आते हैं। प्रशासन भी भीड़ भरे दिनों में सुरक्षा के इंतजाम करता है। बराई माता मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का संगम है। आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद, आज भी लोग यहां पत्थरों की शक्ति में भरोसा जताते हैं। शारदीय नवरात्रि के मौके पर दैनिक भास्कर की टीम राजगढ़ के बराई माता मंदिर धाम पहुंची। हम आपको बता रहे हैं, यहां के धार्मिक महत्व, इतिहास और भक्तों को मिलने वाली सुविधाओं के बारे में… बराई माता मंदिर: पांच कंकर का लेप लगाने से सही होता है चेचक खिलचीपुर के मंडी रोड से पंडाजी बाग और मैला ग्राउंड जाने वाले रास्ते पर बराई माता का मंदिर स्थित है। पत्थरों से घिरी इस बावड़ी के मध्य में माता की सुंदर प्रतिमा विराजमान है, जिनके साथ दो अन्य देवियां भी हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, बरसात में बावड़ी में पानी भरने से कई बार प्रतिमा डूब जाती है, फिर भी भक्तों की आस्था अटूट बनी रहती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां के पत्थरों से जुड़ी अनोखी परंपरा है। मान्यता है कि चेचक (ग्रामीण भाषा में “माता निकलना”) होने पर, भक्त बावड़ी से टूटे हुए पांच कंकर उठाते हैं और उन्हें माता के सामने अर्पित कर मन्नत मांगते हैं। फिर, वे इन कंकरों को घर ले जाकर पानी में घिसकर चेचक से पीड़ित व्यक्ति के चेहरे पर लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि एक से दो सप्ताह तक लगातार लगाने से चेचक के निशान पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। रोगमुक्त होने के बाद, भक्त बचे हुए कंकर को मंदिर में वापस जमा कर देते हैं और खीर, पूड़ी, मीठे मालपुए व भजिए का भोग चढ़ाकर आभार व्यक्त करते हैं। दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु बराई माता मंदिर की प्रसिद्धि केवल राजगढ़ जिले तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान के झालावाड़ और अन्य दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग यहाँ आते हैं। उमाशंकर प्रजापति के अनुसार, हाल ही में झालावाड़ से कुछ लोग चेचक की समस्या लेकर आए थे। उन्होंने यहाँ से कंकर ले जाकर प्रयोग किया और जब वे पूरी तरह से ठीक हो गए, तो उन्होंने स्वयं मंदिर आकर पूड़ी-भजिए का भोग अर्पित किया। प्रशासन की चौकसी मंदिर घने जंगल और कब्रिस्तान के पास स्थित है, इसलिए नवरात्र जैसे भीड़भाड़ वाले दिनों में यहाँ सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी जाती है। प्रशासन ने यहाँ 24 घंटे पुलिस कर्मियों को तैनात किया है ताकि श्रद्धालु बिना किसी डर के पूजा-अर्चना कर सकें। 400 साल पुरानी है परंपरा बराई माता मंदिर के बारे में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि यह लगभग 400 साल पुराना है। रियासतकालीन समय में बनी इस बावड़ी के पत्थरों की मजबूती और बनावट भी मंदिर की प्राचीनता को दर्शाती है। बराई माता मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं है, बल्कि यह आस्था और विश्वास का केंद्र है। आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद, आज भी लोग यहां पत्थरों की शक्ति में विश्वास रखते हैं। चाहे चेचक से मुक्ति की परंपरा हो या मनोकामना पूरी होने पर भोग लगाने की श्रद्धा, बराई माता के प्रति यह आस्था पीढ़ियों से चली आ रही है।


