अभिनव कुमार | जालंधर हिंदुस्तान के सबसे पुराने शास्त्रीय संगीत सम्मेलन- बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन का समापन आज पंडित संजीव अभ्यंकर की गायिकी से होगा। मेवात घराने के पंडित अभ्यंकर पंडित जसराज के शिष्य हैं। वे इस मंच से आठवीं बार प्रस्तुति देंगे। पंडित संजीव अभ्यंकर अब तक पंडित कुमार गंधर्व राष्ट्रीय पुरस्कार, पंडित जसराज गौरव जैसे पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं। साल 1996 में उन्हें ‘सुर रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। दुनिया के 200 से अधिक शहरों में अपनी प्रस्तुति दे चुके पंडित संजीव ने अपनी प्रस्तुति से पहले भास्कर से खास बातचीत की। मेवात घराने की खासियत से लेकर उन्होंने उनके लिए इस मंच की अहमियत को विस्तार से साझा किया। 150वें हरिवल्लभ समारोह में शिरकत करने पर कैसा अनुभव हो रहा है? पहली बार 1992 में इस सम्मेलन के आखिरी दिन आखिरी प्रस्तुति देने का मौका मिला था। सिर्फ 23 साल का था और इस समारोह के इतिहास में समापन करने वाला सबसे यंग आर्टिस्ट बन गया। जो आर्टिस्ट इस मंच पर आखिरी दिन आखिरी प्रस्तुति देता है, उस पर फूलों की वर्षा की जाती है। मुझे सात बार यह सौभाग्य मिला है। इस बार आठवीं बार मिलेगा। मैं मानता हूं कि यह वर्षा संगीत के रसिकों का आशीर्वाद होती है। आज आपकी प्रस्तुति में दर्शक किस तरह की राग-रचनाओं और भावों की अपेक्षा कर सकते हैं? आर्टिस्ट किसी मंच पर क्या सुनाएगा, यह सबकुछ उसके पहले प्रस्तुति देने वाले आर्टिस्ट पर निर्भर करता है। यह सब आखिरी क्षण में ही डिसाइड करता हूं। इस मंच की प्रथा रही है कि इसका समापन मुख्यत: राग बहार से ही होता है। मैं भी इसका ही निर्वहन करूंगा। बाकी के राग में जो देर रात या अल सुबह के समय के राग होते हैं, उन्हीं की प्रस्तुति देने की कोशिश करूंगा। गुरु-शिष्य परंपरा में पंडित जसराज जी की शिक्षण शैली किस प्रकार बाकियों से अनोखी थी? गुरु जी की जो खासियत मुझे सबसे अधिक पसंद है वो ये कि उनका कोई शिष्य जब भी मंच पर कुछ बढ़िया प्रस्तुति देता था तो हमेशा वो दाद देना नहीं भूलते थे। 1984 से 1995 के कालखंड में उनके साथ कई जगह यात्राएं कीं। आज जो कुछ भी हूं, इसमें इसी का बहुत बड़ा हाथ है। आज इस ऐतिहासिक दिन उन्हीं के आशीर्वाद से प्रस्तुति दूंगा। आप मेवात घराने से ताल्लुक रखते हैं। यह घराना बाकी घरानों से किन मामलों में अलग है? शृंगार रस की बंदिशें गाना इस घराने की बड़ी विशेषता है। इसके अलावा इस घराने से जुड़े कलाकार गाते वक्त तीनों सप्तक में अपने गाने को प्रेजेंट करता है। कण, मुरकी के कोमल प्रयोग से ये अलंकार प्रेम-भाव में धड़कन जैसा कंपन पैदा करते हैं, जो मन की संवेदना को सीधे छूता है। इसमें गमक की तानों का उपयोग होता है।


