बाबुल की दुआएं लेती जा, चांदी तो बहुत महंगी:राजस्थान में जनजाति बेटियों के ब्याह में चढ़ती थी 2-3 किलो चांदी, अब समाजों ने 500 ग्राम सीमा तय की

चांदी महंगी होने का असर अब केवल बाजार या कारोबार तक नहीं, बल्कि राजस्थान के जनजाति समाज के रीति-रिवाजों तक भी पड़ा है। जनजाति समाज में सोने के बजाय चांदी का प्रचलन ज्यादा रहा है। पुराने समय से चली आ रही परंपरा के तहत शादी-ब्याह में 2 से 3 किलो तक चांदी चढ़ाई जाती रही है, लेकिन अब दाम बढ़े तो समाजों को बाकायदा पंचायत बुलाकर इसकी सीमाएं तय करनी पड़ रही हैं। अब तक कई समाज अपनी सुधार बैठकें बुलाकर ऐलान कर चुके हैं कि शादी-ब्याह के चढ़ावे में अब कोई भी परिवार 500-750 ग्राम से ज्यादा चांदी नहीं रखेगा। सोने की मात्रा भी सीमित कर एक से आधा तोला तय कर दी गई है। उल्लंघन करने पर जुर्माना लगाने का प्रावधान है। प्रथा-परंपरा पर असर: नोतरा में जुटा लेते थे पूरी राशि, अब बूते से बाहर जनजाति समाज में शादी या अन्य बड़े आयोजन के लिए किसी परिवार को धन की आवश्यकता होती है तो नोतरा प्रथा के तहत समाज को जुटने का निमंत्रण दिया जाता है। पंच-पंचायत के जरिए आहूत नोतरा में पूरा गांव जुटता है और बिना किसी दस्तावेज या ब्याज के अपने सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहायता करता है। यह प्रथा सामाजिक संबंधों व आपसी सहयोग को मजबूत करने का माध्यम भी रही है। शादी-ब्याह के अवसर पर अब तक जब भी नोतरा आहूत हुआ, समाज के लोग 2-3 किलो चांदी की राशि जुटाते रहे हैं, लेकिन अब चांदी बूते से बाहर हो चली है। ऐसे में समाजों ने बैठकें बुलाकर और सहमति बनाकर चांदी चढ़ाने की सीमा निर्धारित कर दी है। समाज-परिवार पर असर: मुश्किल समय में लेन-देन के काम आती थी चांदी, अब महंगी होने से खरीदना मुश्किल भीमपुर आदिवासी समाज चौखला के अध्यक्ष गुलाब सिंह चरपोटा बताते हैं- चौखले के अधीन 64 गांवों के लगभग 7 हजार परिवार आते हैं। चांदी के भाव बहुत बढ़ गए हैं तो फैसला किया है कि कोई भी परिवार शादी में 750 ग्राम चांदी और एक तोला सोने से ज्यादा नहीं देगा। सभी की राय से यह फैसला किया गया। इसी तरह, समाज सुधार कमेटी लालावाड़ा के अध्यक्ष पवन कुमार पटेल बताते हैं, कई परिवार जमीन गिरवी रखकर या ब्याज पर उधार लेकर चांदी के आभूषण बनवाते रहे हैं। अब 650 परिवारों ने फैसला स्वीकार किया है कि शादी में 500 ग्राम चांदी से ज्यादा नहीं चढ़ाएंगे। वाल्मीकि समाज सुधार संस्थान के जिलाध्यक्ष फूलगिरी महाराज बताते हैं, स्वास्थ्य संबंधी कई लाभ होने के कारण पूर्वजों ने चांदी के आभूषणों को रीति रिवाज से जोड़ा था। मुश्किल समय में चांदी ही गरीब परिवारों कों आर्थिक संबल देती आई है, लेकिन जनजाति परिवारों में चांदी का यह सदियों पुराना साथ अब छूट रहा है। हमारे संत-महंतों ने 40 से अधिक गांवों में शादी में होने वाले चढ़ावे में अधिकतम 500 ग्राम चांदी की सीमा तय की है। इस फैसले को 4 हजार जनजाति परिवारों ने सहर्ष स्वीकार किया है।

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