जिन घाटों का टेंडर निकाली गई थी उनमें सोन नदी में आठ व नॉर्थ कोयल नदी में दस घाट शामिल किया गया था। सबसे कम कोयल नदी में बकोरिया का दो करोड़ 47 लाख रुपए और सबसे अधिक सोन नदी में मेरौनी का 119 करोड़ 64 लाख रुपए राशि निर्धारित की गई थी। सोन नदी में सूंडीपुर का 46 करोड़ 84 लाख 70 हजार चार सौ 76 रुपए, गाड़ा खुर्द का 56 करोड़, डुमरसोता 48 करोड़ 30 लाख 75 हजार रुपए, मेरौनी का 119 करोड़ 64 लाख 53 हजार, परती का 40 करोड़ पांच लाख, गम्हरिया का 32 करोड़ 86 लाख रुपए, पिपरा का 25 करोड़ दस लाख रुपए व खोखा घाट का 86 करोड़ 50 लाख रुपए। तीसरी बार सिर्फ एक ठेकेदार भाग ने लिया, अब विभाग के निर्देश का इंजतार : डीएमओ जिला खनन पदाधिकारी राजेंद्र उरांव ने कहा कि पूर्व में निकाले गए टेंडर में घाटो का समूह बनाया गया था। इस बार समूह को तोड़ कर सिंगल-सिंगल कर दिया गया है, लेकिन तीसरी बार निकाले गए टेंडर में सिर्फ एक ही ठेकेदार ने भाग लिया। जबकि नियमत: एक घाट के लिए कम से कम दो ठेकेदार भाग लेते, तभी बोली लगाई जाती। विभाग को सूचित कर दिया गया है। अब विभाग के निर्देश का इंजतार है। जैसा निर्देश प्राप्त होगा वैसा किया जाएगा। पूर्व के दो बार निकाले गए टेंडर में एक भी ठेकेदार ने भाग नहीं लिया था। तीसरी बार कुल 18 बालू घाटों के लिए कुल 718 करोड़ 21 लाख एक हजार आठ सौ 80 रुपए राशि निर्धारित की गई थी। जिसमें अलग-अलग घाटों का अलग-अलग राशि निर्धारित की गई थी। उक्त राशि सिर्फ एक वर्ष के लिए निर्धारित थी। इसके बाद प्रत्येक वर्ष ईएमडी का दस प्रतिशत अधिक राशि जमा करना था। टेंडर पांच वर्षों के लिए निकाला गया था। प्रत्येक वर्ष दस प्रतिशत अधिक राशि जमा नहीं करने पर ठेकेदार की बंदोबस्ती रद्द हो जाती। तीसरी बार 30 नवंबर को टेंडर निकाली में 12 दिसंबर को पेपर अपलोड करने की अंतिम तिथि व 17 नवंबर को जिला स्तरीय तकनीकी समिति की ओर से पेपर की जांच की जानी थी। वहीं 19 दिसंबर को ई-नीलामी की जाती। भास्कर न्यूज | गढ़वा गढ़वा में बालू घाटों की टेंडर के लिए खनन विभाग ने चार महीने में तीसरी बार टेंडर निकाला था। तीसरी बार के टेंडर का बिड खोलने पर सिर्फ एक ठेकेदार कोयल नदी में बकोरिया का दो करोड़ 47 लाख रुपए की सबसे कम लागत वाले घाट के लिए ऑन लाइन टेंडर भरा था। जबकि नियमत: घाट की बंदोबस्ती के लिए कम से कम दो ठेकेदार का प्रति घाट के लिए टेंडर में भाग लेना अनिवार्य है। भाग लेने वाला ठेकेदार उत्तर प्रदेश का बताया जाता है। शेष किसी भी घाट के लिए ठेकेदारों ने रुचि नहीं ली। अब बालू की स्थिति वैसी की वैसी ही रह गई। जिले में बालू की समस्या का समाधान अभी तक नहीं किया जा सका। अब भी लोग पड़ोसी राज्य बिहार के बालू पर ही आश्रित हैं। बालू घाटों में संवेदकों की रुचि नहीं लेने के पीछे पेशा कानून लागू नहीं होना और घाटों का मूल्य अधिक होना बताया जा रहा है। विभाग का तीसरी बार सिंगल-सिंगल घाटों की नीलामी करने की योजना भी विफल हो गई।


