छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित गणेश मंदिर की विशेषता यह है कि यहां भगवान गणेश की स्वयम्भू प्रतिमा स्थापित है। जिसके सिर पर शेष नाग विराजमान हैं। इसी कारण भक्त उन्हें शेष गजानंद के नाम से पूजते हैं। यह मंदिर बालोद जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर, डौंडीलोहारा-राजनांदगांव मुख्य मार्ग पर ग्राम परसूली में स्थित है। यहां हजारों भक्तों की गहरी आस्था जुड़ी है। गणेश चतुर्थी पर पूरे प्रदेश से श्रद्धालु मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। नवरात्र नहीं, गणेश चतुर्थी पर जलते हैं ज्योतिकलश आम तौर पर नवरात्र में मनोकामना ज्योतिकलश की परंपरा देखी जाती है। लेकिन परसूली गांव का यह मंदिर इस मामले में अलग है। यहां पिछले 40 सालों से हर साल गणेश चतुर्थी के दिन मनोकामना ज्योतिकलश प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। जो लगातार 11 दिनों तक जलते हैं। इस बार प्रदेशभर से आए भक्तों ने कुल 111 ज्योतिकलश स्थापित किए हैं। ग्रामीणों के स्वप्न में आए भगवान गणेश – पुजारी 80 साल के मंदिर पुजारी भगवानी राम बचपन से ही यहां सेवा कर रहे हैं। उनका कहना है कि करीब 400 साल पहले यह प्रतिमा तीन गांवों की सरहद पर जमीन से प्रकट हुई थी। मान्यता है कि भगवान गणेश ग्रामीणों के सपने में आए और उनके संकेत पर प्रतिमा को गांव के पीपल के पेड़ के पास स्थापित किया गया। साल-दर-साल बढ़ रहा है प्रतिमा का आकार गांव के गौकरण सोनकर और नोहर राजपूत ने बताया कि उनजे पूर्वज कहा करते थे कि स्थापना के समय भगवान गणेश की प्रतिमा मात्र एक फीट ऊंची थी। लेकिन धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ता गया और अब यह करीब पांच फीट की हो चुकी है। ग्रामीण इसे चमत्कार मानते हुए हर साल गणेश चतुर्थी पर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। उनका विश्वास है कि शेष गजानंद के चरणों में सच्चे मन से मत्था टेकने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। यही वजह है कि गणेश चतुर्थी पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।


