बिना मिट्‌टी, हवा में तैयार हो रहे आलू के पौधे:एरोपोनिक्स पद्धति से एक पौधे में 60 से ज्यादा आलू लगेंगे, किसानों की आय 10-12 गुना बढ़ेगी

इंदौर में एरोपोनिक्स पद्धति (जड़ों के हवा में रहने) से आलू के बीजों का उत्पादन किया जा रहा है। इस पद्धति से तैयार होने वाले पौधे की जड़ों में 5 से 6 की जगह 60 से 65 आलू लगेंगे। इतना ही नहीं किसानों को यह आलू वायरस फ्री मिलेंगे। इस वजह से इनकी पैदावार लेने में खाद, पानी और पेस्टिसाइड का खर्च भी बचेगा। यह बीज बाजार यानी किसानों के हाथ तक पहुंचने में समय लगेगा, लेकिन इस बीज से किसानों की आय दस से बारह गुना तक बढ़ जाएगी। इंदौर स्थित कृषि कॉलेज में एक अत्याधुनिक एरोपोनिक लैब तैयार की गई है। जहां व्यवसायिक तौर पर अंचल के किसानों के लिए उन्नत किस्म के वायरस फ्री आलू का दस गुना ज्यादा उत्पादन किया जा सकेगा। इंदौर से पहले इस तरह की लैब ग्वालियर और सिहोर में तैयार की जा चुकी है। इंदौर में इस पद्धति पर काम शुरू हो गया है। कृषि कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर और एरोपोनिक यूनिट की प्रभारी डॉ. अंकिता साहू ने बताया कि बीज तैयार करने के लिए आलू की स्टेम (तने का बहुत पतला हिस्सा) को पौधे के रूप में विकसित किया जाता है। एरोपोनिक पद्धति से तैयार बीज वायरस-संक्रमण मुक्त एरोपोनिक यूनिट की प्रभारी डॉ. अंकिता साहू ने बताया कि आलू के ये बीज चूंकि अधिकांश समय हवा में रहे होते हैं, इसलिए इनमें किसी तरह वायरस नहीं लगता। इन्हें जब हम उत्पादन के लिए खेतों में लगाते हैं तो यहां भी इस बीज में किसी तरह का रोग या वायरस नहीं लगता है। डॉ. साहू का दावा है कि इस तरह के बीजों से आलू का उत्पादन करने वाले किसानों को किसी भी तरह के कीटनाशकों के छिड़काव की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। इंदौर के लिए क्यों जरूरी है इतनी अधिक पैदावार इंदौर और मालवा निमाड़ में आलू की पैदावार बड़ी मात्रा में होती है। इंदौर में 45 हजार हैक्टेयर में हर साल 20 लाख मैट्रिक टन आलू की पैदावार होती है। यहां का आलू देशी-विदेशी कंपनियां चिप्स बनाने के लिए खरीदती है। राज्य सरकार की एक जिला-एक उत्पाद योजना के तहत इंदौर का आलू चयन किया गया है। यहां के एक बड़े हिस्से में शुगर-फ्री आलू भी पैदा किया जाता है। आलू उत्पादन में मध्य प्रदेश का भारत में पांचवां स्थान है। इंदौर के अलावा भोपाल, उज्जैन, देवास, शाजापुर और ग्वालियर में सबसे ज्यादा आलू की पैदावार होती है। अभी कितना खर्च आता है आलू की फसल पर एक एकड़ में आलू की पैदावार लेने में किसानों को आमतौर पर 65 से 70 हजार रुपए का खर्च आता है। इसमें बीज, दवा, खाद, निंदाई, मजदूरी सहित अन्य सभी खर्च शामिल रहते हैं। यदि किसानों को बीज सस्ते दामों पर मिलेगा तो किसानों को एक एकड़ में 15 से 20 हजार रुपए बचेंगे। वहीं दवा पर होने वाला 10 से 15 हजार का खर्च भी बचेगा। यानी किसानों को प्रति एकड़ 25 से 30 हजार रुपए की बचत होगी। आमतौर पर आलू में ये बीमारियां होती हैं झुलसा रोग : यह रोग आल्टनेरिया सोलेनाई नामक फफूंद से होता है। इसमें फसल बोने के तीन से चार हफ्तों के बाद पत्तियों पर धब्बे हो जाते हैं। ये पत्तियों को नष्ट करते हुए तने के रास्ते जड़ों और फिर आलू तक पहुंच जाता है। दूसरा पौधे में जरूरत से ज्यादा नमी या बारिश का पानी मिलने से फाइटोफ्थोरा इनफेस्टेन्स नामक फफूंद फैल जाती है। यह फफूंद एक सप्ताह में पौधों की हरी पत्तियों को नष्ट कर देती है। मोड़क रोग : यह एक वायरस जनित बीमारी है जो सोलेनम वायरस से फैलती है। इससे पत्तियां पीली होने के साथ-साथ ऊपर से मुड़ जाती है फिर धीरे-धीरे गिरने लगती हैं। सड़न रोग : यह एक जीवाणु जनित रोग है, रोगी पौधे सामान्य पौधों की अपेक्षा बौने हो जाते हैं, जो कुछ ही समय में मुरझा जाते हैं, जिससे उनका विकास रुक जाता है, रोगी पौधा सूख जाता है और जीवाणु जड़ से पौधे के शीर्ष भाग तक पहुंच जाते हैं।

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