चित्तौड़गढ़ में फर्जी तरीके से वीआईपी नंबरों का इस्तेमाल कर गाड़ियों का संचालन करने और बैकलॉग के जरिए पंजीयन में गड़बड़ी करने का एक मामला सामने आया है। इस मामले में परिवहन विभाग ने पहली बार सदर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है। एफआईआर दर्ज होने के बाद यह साफ हो गया है कि यह मामला सिर्फ दो गाड़ियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी परतें खुलने पर कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं। बैकलॉग से जुड़े मामलों में पहले भी डीटीओ और परिवहन निरीक्षक जैसे अधिकारियों पर कार्रवाई कर चुका है, लेकिन अब पुलिस जांच शुरू होने से पूरे नेटवर्क के सामने आने की उम्मीद है। सदर थाने में दर्ज हुआ पहला मामला सदर थाने के एएसआई एवं अनुसंधान अधिकारी शंकरलाल ने बताया कि शनिवार को ही उन्हें इस मामले की जांच सौंपी गई है। यह एफआईआर प्रादेशिक परिवहन कार्यालय चित्तौड़गढ़ में पदस्थापित परिवहन निरीक्षक किशनलाल तेली ने दर्ज करवाई है। एफआईआर में बताया गया है कि कुछ गाड़ियों के ऑनलाइन रिकॉर्ड और आरटीओ कार्यालय में संधारित मूल रिकॉर्ड में बड़ा अंतर पाया गया है। यही अंतर इस पूरे फर्जीवाड़े की जड़ है, जिसके आधार पर पुलिस अब जांच को आगे बढ़ा रही है। ऑनलाइन रिकॉर्ड और असली हकीकत में फर्क एफआईआर के अनुसार गाड़ी संख्या आरएसएच 656 का मामला सबसे पहले सामने आया। आरटीओ कार्यालय के ऑनलाइन पंजीयन रिकॉर्ड में यह गाड़ी जीप के रूप में दर्ज है और इसका मालिक राजेश कुमार पुत्र गणपत, निवासी कुंभानगर बताया गया है। लेकिन जब आरटीओ के मूल रिकॉर्ड की जांच की गई तो सामने आया कि यह गाड़ी जीप नहीं बल्कि ऑटो रिक्शा है। इस ऑटो रिक्शा का असली पंजीकृत मालिक दलीचंद पुत्र छोगालाल, निवासी सदर बाजार है। आरोप है कि राजेश कुमार ने फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर ऑटो रिक्शा को कार की श्रेणी में ऑनलाइन दर्ज करवा दिया, ताकि वीआईपी नंबर हासिल किया जा सके। दूसरे वाहन में भी बदला मालिक एफआईआर में एक और गाड़ी संख्या आरजेएच 0258 का जिक्र किया गया है। ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार यह गाड़ी रूपसिंह पुत्र कानसिंह, निवासी कुंभानगर के नाम से पंजीकृत है। लेकिन जब बैकलॉग के दौरान अपलोड किए गए पंजीयन प्रमाण पत्र को देखा गया तो उसमें गाड़ी का मालिक मूलचन्द्र पुत्र सेवाराम, निवासी नीमच (मध्यप्रदेश) दर्ज पाया गया। जांच में सामने आया कि बैकलॉग की प्रक्रिया में षड्यंत्रपूर्वक कूटरचित दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया और गाड़ी को ऑटो की जगह कार के रूप में ऑनलाइन दर्ज कर दिया गया। इससे साफ है कि सिर्फ गाड़ी का प्रकार ही नहीं, बल्कि पंजीकृत स्वामी तक बदले गए हैं। ऑटो रिक्शा को बना दिया कार जानकारी के अनुसार चित्तौड़गढ़ जिले में बैकलॉग के जरिए वीआईपी नंबरों का बड़ा फर्जीवाड़ा हुआ है। बताया जा रहा है कि ऐसे 3 से 4 दर्जन वाहन पंजीकृत किए गए हैं, जिनमें ऑटो रिक्शा जैसे वाहनों को फर्जी दस्तावेजों के सहारे कार की श्रेणी में दिखाया गया। कार के रूप में पंजीयन होने से इन वाहनों को वीआईपी नंबर आसानी से मिल गए। यह एक गंभीर मामला है, क्योंकि बिना विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के इस तरह का फर्जीवाड़ा होना लगभग असंभव माना जा रहा है। अब पुलिस जांच में यह बात सामने आ सकती है कि इस खेल में कौन-कौन शामिल रहा। पहले ही निरस्त किए जा चुके पंजीयन इस पूरे मामले के सामने आने के बाद परिवहन विभाग ने कुछ गाड़ियों पर पहले ही कार्रवाई कर दी है। वाहन संख्या आरएसएच 5656 और आरजेएच 258 के पंजीयन प्रमाण पत्र राजस्थान मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 55(5) के तहत निरस्त किए जा चुके हैं। इसके अलावा कई अन्य गाड़ियों की भी विभागीय स्तर पर जांच चल रही है। जिन गाड़ियों में गड़बड़ी की आशंका है, उनके रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि बैकलॉग के नाम पर और कितने फर्जी पंजीयन किए गए हैं। पुलिस जांच से खुलेंगे कई राज परिवहन विभाग ने इस मामले में राजेश कुमार और रूपसिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा कर पुलिस जांच का रास्ता खोल दिया है। अब जांच में यह सामने आने की उम्मीद है कि फर्जी दस्तावेज कहां से बनाए गए, बैकलॉग की प्रक्रिया में किन-किन लोगों की भूमिका रही और कितने वीआईपी नंबर इस तरीके से हासिल किए गए। यह मामला न सिर्फ परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि नियमों की अनदेखी कर किस तरह से सिस्टम का दुरुपयोग किया गया। आने वाले दिनों में पुलिस जांच के साथ ही इस फर्जीवाड़े की पूरी तस्वीर सामने आने की संभावना है।


