मंगलवार को छत्तीसगढ़ में भक्त माता कर्मा की जयंती मनाई गई। 1009वीं जयंती के मौके पर प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने माता कर्मा का डाक टिकट जारी किया। कार्यक्रम में डिप्टी CM अरुण साव, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, साहू समाज के प्रदेश अध्यक्ष टहल सिंह साहू शामिल हुए। राजधानी रायपुर स्थित कर्माधाम परिसर में माता कर्मा को समर्पित कार्यक्रम ये खास आयोजन किया गया। इस रिपोर्ट में जानिए भक्त माता कर्मा के बारे में। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री साय ने कहा भक्त माता कर्मा का जीवन निष्ठा, बलिदान और भक्ति की मिसाल है। राजिम माता की मूर्ति स्थापना सहित अन्य विकास कार्यों के लिए पूर्व में घोषित 5 करोड़ रुपए की राशि अब बजट में शामिल कर दी गई है, जिससे समाज के धार्मिक स्थलों के विकास को नई गति मिलेगी। उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने माता कर्मा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि माता कर्मा का आशीर्वाद समाज और प्रदेश दोनों के लिए कल्याणकारी है। केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू ने डाक टिकट विमोचन को तैलिक समाज के लिए गर्व का क्षण बताते हुए कहा यह डाक टिकट एक प्रतीक नहीं, बल्कि माता कर्मा के संघर्ष, सेवा और त्याग की राष्ट्रीय मान्यता है। समारोह में छत्तीसगढ़ साहू समाज के अध्यक्ष टहल सिंह साहू ने स्वागत उद्बोधन दिया। संत माता कर्मा आश्रम शक्तिपीठ रायपुर को सामाजिक योगदान के लिए “गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स” से सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ में 30 लाख से ज्यादा मानने वाले
एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश में साहू समाज के लोगों की आबादी 30 लाख से अधिक है। प्रदेश में साहू समाज के लिए भक्त माता कर्मा पूजनिय हैं। तैलिक समाज की भक्त माता कर्मा को देवी तरह पूजा जाता है। भगवान कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति की वजह से उन्हें भक्त माता कर्मा कहा जाता है। झांसी में हुआ जन्म, भगवान ने दिए दर्शन
भक्त माता कर्मा को लेकर कहा जाता है कि झांसी में तैलकार रामशाह साहू के यहां उनका जन्म हुआ । पिता रामशाह ने अपना निर्णय सुनाया कि मेरे सत्कार्यों से मुझे बेटी मिली है, इसलिए मैं उनका नाम कर्माबाई रखूंगा। उन्हें बचपन से भगवान श्रीकृष्ण के भजन-पूजन आराधना में ही विशेष आनंद मिलता था। कर्मा बाई की शादी पद्मा साहू नाम के तेल के बड़े व्यापारी से हुई थी। पति धनी होने की वजह से दूसरों को जलन होती थी इसलिए पद्मा साहू को फंसाने और उनके तेल व्यवसाय को ठप करने के लिए राजा नल के पुत्र ढोला ने आज्ञा दी कि राज्य के तेल के तालाब को पांच दिन में भरा जाए। पद्मा साहू दिये गये समय के पश्चात तालाब को तेल से भरने में असफल रहे। उसे सभी तेली समाज के समाने शर्मिन्दा होना पड़ा। यह बात माता कर्मा बाई को पता चली तो उन्होंने अपने पति का कष्ट दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में अपनी अंतरात्मा एक कर दी और इनकी भक्ती और श्री कृष्ण जी की माया से पूरा तालाब तेल से भर गया था। यह बात तुरंत ही सभी तेली समाज में फैल गई और सभी को एक बड़े संकट से छुटकारा मिल गया। इस दिन से ही कर्मा बाई को “माता कर्मा बाई” के नाम से जाना जाता है। कुछ समय बाद अचानक अस्वस्थता से पति का निधन हो गया, पति के चिता के साथ माता ने सती होने का संकल्प कर लिया। इसी समय आकाशवाणी हुई। यह ठीक नहीं है, बेटी तुम्हारे गर्भ में एक शिशु पल रहा है, समय का इंतजार करो मैं तुम्हें जगन्नाथपुरी में दर्शन दूंगा। एक रात के सन्नाटे में माता भगवान को भोग लगाने के लिए कुछ खिचड़ी लेकर जगन्नाथ पुरी के लिए निकल पड़ीं। चलते-चलते थककर एक छांव में विश्राम करने लग गई, आंख लग गई, आंख खुली तो माता कर्मा अपने आपको जगन्नाथपुरी में पाया।
आश्चर्य से खुशी में भक्तिरस में डूबी, खिचड़ी का प्रथम भोग लगाने सीढ़ियों की ओर बढ़ी। उसी समय पूजा हो रही थी। पुजारी ने माता कर्मा को धकेल दिया इससे माता कर्मा गिर पड़ी। रोते हुए माता कर्मा पुकारती है- हे! जगदीश आप पुजारियों की मरजी से कैद क्यों है? कहा जाता है कि इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण कर्मा के पास आए और बोले- कर्मादेवी, मुझे खिचड़ी खिलाइए। माता कर्मा भाव विभोर होकर खिचड़ी खिलाने लगी भक्त माता को भगवान ने कहा- हम तुम्हारे भक्ति से प्रसन्न हो गए हैं कुछ भी वरदान मांगो। माता ने कहा मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस आप मेरी खिचड़ी का भोग लगाया करें। मैं बहुत थक चुकी हूं मुझे आपके चरणों में जगह दे दीजिए। कुछ समय बाद भक्त माता का जगन्नाथ पुरी में ही निधन हो गया मगर तब से भगवान जगन्नाथ को हर दिन खिचड़ी का भोग आज तक लग रहा है। वही खिचड़ी जो महाप्रसाद कहलाती है। माता की प्रतिमा जब भी बनाई जाती है तो भगवान कृष्ण का खिचड़ी खिलाते ही उन्हें दिखाया जाता है।


