भगवान की कृपा से ही संभव है माया से छुटकारा पाना: स्वामी युगल शरण

भास्कर न्यूज | जांजगीर ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के पांचवें दिन भगवत कृपा विषय पर डॉ. स्वामी युगल शरण जी ने प्रकाश डाला और श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक दृष्टि से मार्गदर्शन दिया। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि भगवान को जानना संभव है, लेकिन यह किसी व्यक्ति की अपनी बुद्धि, अध्ययन या ग्रंथ-पठन से नहीं होता। भगवत ज्ञान प्राप्ति भगवत कृपा से संभव है। स्वामी जी ने कहा, “वेद स्पष्ट कहता है कि माया कभी नष्ट नहीं होती। माया से छुटकारा हमारे बल से संभव नहीं, परंतु भगवान की कृपा से इसे पार किया जा सकता है। वही भगवत प्राप्ति का मार्ग है।” उन्होंने बताया कि केवल गीता या भागवत का पाठ करने से या श्लोकों का ज्ञान होने से व्यक्ति ज्ञानी नहीं बनता। ऐसा ज्ञान कभी-कभी अहंकार और ज्ञानाभिमान उत्पन्न करता है, जो भगवान से दूरी बढ़ाने वाला बाधक है। भगवत प्राप्ति के लिए सच्चा उपाय यही है कि भगवान कृपा करें। स्वामी जी ने माया की प्रकृति पर भी प्रकाश डाला। गीता में कहा गया है—“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।” इसका अर्थ है कि माया अत्यंत कठिन है और साधना से भी इसे पार करना आसान नहीं। बड़े योगी, मुनीन्द्र, शंकराचार्य भी माया को अपनी साधना के बल से पार नहीं कर पाए। केवल भगवान की कृपा से ही जीव माया से मुक्त होकर भगवत अनुभव प्राप्त कर सकता है। अंततः स्वामी जी ने सभी श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि माया के प्रभाव से उबरने और भगवत कृपा पाने का मार्ग साधना, भक्ति और सत्संग से होकर गुजरता है। उन्होंने कहा कि जब भगवान कृपा करेंगे, तो जीव भगवान को जान पाएगा, देख पाएगा और अपने जीवन में सच्ची कृतार्थता अनुभव करेगा। भगवान निःस्वार्थ, अकारण करुण हैं : प्रवचन में भगवान का कर्त्तृत्व और जीव का कर्म विषय भी समझाया गया। स्वामी जी ने कहा कि भगवान प्रयोजक कर्त्ता हैं—वे मन, बुद्धि और इन्द्रियों को कार्य करने की शक्ति देते हैं, लेकिन जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्त्ता है। यही कारण है कि भगवान सभी का पालन-पोषण करते हुए भी जीवों को उनके कर्मों का फल भोगने देते हैं। स्वामी जी ने पूछा—“भगवत् कृपा का कोई मूल्य है क्या?” और उत्तर दिया कि भगवान निःस्वार्थ, अकारण करुण हैं। तुलसीदास, मीरा, सूरदास जैसे भक्तों पर भगवान कृपा कर चुके हैं, और हम भी भगवत कृपा के योग्य बनने के लिए सच्चे भक्ति, शरणागति और संतों के सत्संग की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

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