दौसा जिला मुख्यालय से करीब 10 किमी दूर लवाण तहसील का ढिगारिया गांव। यहां से सिंगवाड़ा होते हुए दौसा जाने वाली सड़क पर एक कतार में बने एक जैसे 6 मकान देख अनायास ही नजरें ठहर जाती हैं। इन मकानों में कौन रहता है यह जाने बिना ही उसके मुंह से यह निकलता है,भाइयों में प्रेम हो तो ऐसा। और कहानी सच में है भी ऐसी ही। इस दौर में जब सगे भाइयों के बीच विवाद के किस्से सामने आते हैं, वहीं यहां चाचा-ताऊ के बेटे भाइयों के बीच आपसी सौहार्द्र, सामंजस्य और प्रेम की मिसाल है। अक्सर जब परिवार बढ़ता है तो लोग अलग रहने लगते हैं, लेकिन यहां एक पिता की संतान नहीं होने के बावजूद एक साथ रहने के लिए नए मकान बनवा लिए। अनायास ही ठहर जाती हैं नजरें… दौसा जिला मुख्यालय से करीब 10 किमी दूर लवाण तहसील का ढिगारिया गांव राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल महेंद्रसिंह गुर्जर बताते हैं कि उनके दादा के चार बेटे थे। गांवों में चारों के अलग-अलग घर थे। मेरे पिताजी रामजीलाल गुर्जर भी कांस्टेबल थे। मेरा छोटा भाई यशपाल भी कांस्टेबल है। बड़े चाचा गिर्राज प्रसाद किसान हैं और उनके दो बेटे हरिसिंह व राजेंद्र हैं। उनसे छोटे चाचा गुट्ठल राम के एक बेटा सुभाष और सबसे छोटे चाचा शंभुदयाल के एक बेटा भरतसिंह है। हम छहों भाइयों में खूब प्रेम है। जब सब नौकरी व कामकाज करने लगे तो कई बार देर-सवेर भी आना होता। इससे आपस में मिलना कम हो गया। कोविड के दौरान यह बात ज्यादा खलने लगी तो सभी भाइयों ने तय किया कि कुछ भी हो जाए, रहेंगे एक साथ। पिताजी घर में सबसे बड़े थे, ऐसे में हम भाइयों ने उनके सामने यह प्रस्ताव रखा। उन्होंने सबको एक साथ बुलाया और यह जानकारी दी तो सभी सहर्ष राजी हो गए। हम भाइयों ने यह भी तय किया कि चाहे कोई कम कमाए या ज्यादा,सबके मकान भी एक जैसे होने चाहिए। इस पर हमने जयपुर के एक आर्किटेक्ट को हायर किया। वर्ष 2021 में काम शुरू किया और दो साल में सबके मकान बन गए। 19 फरवरी 2024 में गृह प्रवेश किया। अगले माह इसकी पहली एनिवर्सरी है। यह है छहों मकान की खासियत सभी छहों भाइयों के लिए दो-दो के जोड़े में मकान बनाए गए जो अंदर से आपस में कनेक्ट हैं। सभी 2 बीएचके। साइज, डिजाइन, रंग और इंटीरियर सब एक जैसी। सभी छहों मकान की छत एक ही है। इन सभी मकानों के नीचे कॉमन बेसमेंट है। आगे कॉमन चबूतरा और सामने तथा पीछे कॉमन जमीन। एंट्रेंस भी कॉमन। घर पर रहते हैं तो अब हर हाल में सुबह शाम आपस में एक दूसरे से मिलना होता ही है। रिश्तेदार भी खुश हैं। उन्हें अलग-अलग नहीं जाना पड़ता। इन छह मकानों में छोटे-बड़े करीब 40 सदस्य रहते हैं। तीज-त्योहार पर एक जगह खाना बनता है, एक साथ मनाते हैं। छुट्टी क दिन भाई एक साथ बैठते हैं। यहां तक कि सामाजिक आयोजनों में भी सब एक साथ आते-जाते हैं।


