​​​​​​​भाजपा संगठन व जनप्रतिनिधियों के बीच मतभेद:विधायकों के दखल से कई मंडलों में अध्यक्ष पर सहमति नहीं, जिलाध्यक्ष तय नहीं कर सके संगठन

भाजपा पार्टी बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक निर्वाचन पद्धति के आधार पर बनाए जाने का दावा करती है, लेकिन हालात यह है कि अब तक निर्वाचन के नाम पर केवल सहमति से बूथ व मंडल अध्यक्षों का नाम तय किया जा रहा है। वहीं कई मंडलों में विधायकों के दखल से अध्यक्ष का नाम ही तय नहीं हो पाया है। इससे संगठन चुनावों में 10 से 15 दिन की देरी हुई है। संगठन व जनप्रतिनिधियों के बीच मतभेद की वजह से कई मंडलों में अध्यक्ष पर सहमति नहीं बन पाई है। ऐसे मंडल से लेकर जिला अध्यक्ष तक चुनाव में देरी हो रही है। प्रदेश संगठन अभी तक जिलाध्यक्ष का नाम तय नहीं कर पाया है। जबकि 15 दिसंबर तक मंडल अध्यक्ष और 30 दिसंबर तक जिला अध्यक्षों का चुनाव करवाना था। लेकिन अभी तक बूथ अध्यक्ष व सदस्यों निर्वाचन ही कर पाई है। पार्टी की ओर से 500 से ज्यादा मंडलों में अध्यक्ष नियुक्ति नहीं हो पाए है। इसके बाद 44 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति होगी। जबकि पिछली बैठक में प्रदेश प्रभारी ने हर हाल में 3 जनवरी तक मंडल अध्यक्षों की सूची तैयार करने और 10 जनवरी तक जिला अध्यक्ष की नियुक्ति करने को कहा था, ताकि प्रदेशाध्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जा सके। प्रदेश में 52 हजार बूथ में से 47 हजार बूथ अध्यक्ष बन चुके है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि पार्टी बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक निर्वाचन पद्धति के आधार पर बनाए जाते है। अब 8 से 9 जनवरी तक जिला अध्यक्ष बन जाएंगे। जिलाध्यक्षों के निर्वाचन के बाद प्रदेश अध्यक्ष पद की चुनाव प्रक्रिया पू री होगी। इसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाएंगे। फिर कार्यकारिणी बनाई जाएगी और कार्यों का वितरण होगा तब कार्यों के विभाजन के साथ पन्ना प्रमुख नियुक्त किए जाएंगे। कार्यकर्ता मजबूती से कार्य करे और क्षेत्र में अपने संपर्क व्यापक बनाए। इसके साथ ही देशहित व समाज हित की भावना के साथ सबके विकास में सहयोग करें, इसी धारणा के साथ सभी को कार्य विभाजन किया जाता है। संगठन ने गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजयभाई रूपाणी को चुनाव अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई है। विधायकों दखल बढ़ा पार्टी ने तय किया है कि मंडल व जिला अध्यक्ष का चुनाव आम सहमति से किया जाए। ताकि चुनाव की नौबत नहीं आए। पर्यवेक्षकों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। विधायक, सांसद सहित अन्य जनप्रतिनिधियों से संगठन चुनाव में राय ली जाएगी। लेकिन अधिकांश विधायक अपने नजदीकी लोगों को ही मंडल अध्यक्ष बनाने की जुगत में लगे है।

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