जयपुर में भास्कर उत्सव में देश के टॉप कार्डियक सर्जन पद्मश्री डॉ. नरेश त्रेहान ने कहा कि आज भी बड़ी संख्या में हार्ट डिजीज को कंट्रोल किया जा सकता है, बशर्ते लोग समय रहते जांच कराएं और अपनी दिनचर्या पर ध्यान दें। अगर कोलेस्ट्रॉल और बीपी को कंट्रोल में रखा जाए तो हार्ट फेल्योर के कई मामले रोके जा सकते हैं। इसके साथ बैलेंस डाइट और सही लाइफस्टाइल फॉलो करना भी जरूरी है। हार्ट अटैक अचानक नहीं होता। यह बीमारी 20-25 सालों में धीरे-धीरे बढ़ती है। पुराने समय की हिंदी फिल्मों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि फिल्मों में पहले यह दिखाया जाता था कि किसी व्यक्ति की लड़की किसी के साथ भाग गई। ऐसे में पिता को सदमे के कारण अचानक हार्ट अटैक आ जाता था। इसका सारा दोष लड़की के ऊपर आ जाता था, जबकि हकीकत यह होती थी कि हार्ट अटैक उसे अचानक नहीं, बल्कि 20-25 सालों में बढ़ा हुआ है। तनाव बीमारी को ट्रिगर कर सकता है, लेकिन बीमारी पैदा नहीं करता। बीमारी पहले से शरीर में मौजूद होती है। स्मोकिंग, पॉल्यूशन से बढ़ते हार्ट फेल्योर, ब्रेस्ट कैंसर और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों पर विस्तार से चर्चा की गई। डॉ. नरेश त्रेहान ने कहीं ये 4 बड़ी बातें.. 1. फैमिली हिस्ट्री होने पर 25 साल की उम्र से कराएं जांच
डॉ. नरेश त्रेहान ने कहा कि अगर किसी की फैमिली हिस्ट्री में हार्ट डिजीज है, तो 25 साल की उम्र से ही पूरी असेसमेंट कराना जरूरी है। इससे यह पता चल सकता है कि बीमारी की शुरुआत हो रही है या नहीं और रिस्क फैक्टर बढ़ तो नहीं रहे। डॉ. त्रेहान ने कहा कि सबसे जरूरी बात यह है कि रिस्क को कम करने की ताकत लोगों के अपने हाथ में है।
2. पुरुष मिस कर जाते हैं वार्निंग साइन
जेंडर डिफरेंस पर बात करते हुए त्रेहान ने कहा कि हार्ट अटैक के लक्षणों को लेकर पुरुष और महिलाओं का व्यवहार अलग होता है। महिलाएं चेस्ट पेन या तकलीफ होने पर परिवार में किसी न किसी को जरूर बताती हैं, जबकि पुरुष अक्सर जिम्मेदारियों के चलते दर्द को नजरअंदाज कर देते हैं। इसी वजह से पुरुष कई बार वार्निंग साइन मिस कर जाते हैं। चेस्ट पेन सिर्फ दर्द तक सीमित नहीं होता, इसमें सांस फूलना, पसीना आना और बेचैनी जैसे लक्षण भी शामिल हो सकते हैं। इन्हें एसिडिटी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में जहां डाइट हैवी होती है। 3. डाइट पर कंट्रोल जरूरी
डाइट पर बात करते हुए डॉ. त्रेहान ने कहा कि दाल-बाटी-चूरमा जैसी हैवी डाइट अगर लगातार ली जाए और फिजिकल एक्टिविटी कम हो, तो रिस्क बढ़ जाता है। उन्होंने साफ किया कि यह नहीं कहा जा रहा कि सब कुछ छोड़ दें, लेकिन मात्रा और बैलेंस समझना जरूरी है। एक प्लेट में 8-10 पकोड़े खाने की आदत पर कंट्रोल होना चाहिए। 4. जीनोम टेस्ट सबके लिए जरूरी
जेनेटिक टेस्टिंग को लेकर उन्होंने बताया कि पहले जीनोम टेस्ट कराने में करीब 2 लाख रुपए खर्च होते थे, लेकिन अब वही टेस्ट 10 हजार रुपए के आसपास हो रहा है। इससे हार्ट डिजीज, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों के रिस्क का पहले ही पता लगाया जा सकता है। आज के टेस्ट पहले से कहीं ज्यादा पावरफुल हैं और इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किसी व्यक्ति में बीमारी का रिस्क कितना है। कार्यक्रम के अंत में जब उनसे सवाल किया गया कि अगर उन्हें हेल्थ मिनिस्टर बनाया जाए तो वे सिस्टम में क्या बदलाव करना चाहेंगे, इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वे अपने काम से संतुष्ट हैं और लोगों को जागरूक करना ही सबसे बड़ा बदलाव है।


