भास्कर संवाददाता| विदिशा निर्यापक श्रमण मुनि संभव सागर महाराज ने कहा कि सभी जीव सुखी हों और रोगमुक्त रहें, यह भावना केवल शब्दों की नहीं, बल्कि हृदय से निकलनी चाहिए। वे श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि सच्ची अहिंसा, करुणा और वैराग्य तभी संभव हैं, जब हमारे भाव शुद्ध हों। मुनि श्री ने श्रद्धालुओं की साधना की सराहना की। कहा कि इतनी ठंड में भी आप लोग सुबह मंदिर आकर दर्शन, पूजन और प्रवचन का लाभ ले रहे हैं। कई लोग अभी तक रजाई से बाहर नहीं निकले होंगे। इस दृष्टि से आप लोग उनसे भी श्रेष्ठ हैं। लेकिन आत्ममंथन भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि परिग्रह और आसक्ति के भाव एकदम से नहीं छूटते। मोहनीय कर्म जीव को बांधे रखता है। प्रतिदिन मंदिर आने और शास्त्र स्वाध्याय करने के बावजूद यदि मन दुकान, पड़ोसी के मकान या सहेली की साड़ी में उलझा रहे, तो समझ लेना चाहिए कि मंदिर में आकर भी हम संसार में ही भटक रहे हैं। मुनिश्री संभव सागर महाराज ने आज की पारिवारिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब हम दो और हमारे दो भी नहीं, कई घरों में केवल दो ही प्राणी रह गए हैं। संतानें विदेश या महानगरों में बस गई हैं, लेकिन फिर भी पड़ोस का मकान बिकता दिखे तो उसे खरीदने की इच्छा जाग उठती है। मुनि श्री ने स्पष्ट कहा कि जितना अधिक परिग्रह होगा, उतना ही पाप का संचय भी बढ़ेगा। चाहे सफाई के लिए कर्मचारी रखे हों, लेकिन उस प्रक्रिया में होने वाली हिंसा के भागीदार घर के मालिक ही होते हैं। एक प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने बताया कि सुबह एक भाई उनके पास आए और बोले कि रात को बाल्टी में पानी भरा रह गया था, सुबह देखा तो उसमें एक चूहा मरा हुआ था, कृपया प्रायश्चित दें। मुनि श्री ने कहा कि चूंकि वह व्यक्ति मंदिर आता था और गुरुजनों से जुड़ा हुआ था, इसलिए उसके मन में करुणा का भाव जागा और उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। मुनि श्री ने कहा कि बड़ा बंगला होने का अर्थ है अधिक सफाई और अधिक हिंसा, जिसकी जिम्मेदारी भी उसी व्यक्ति की होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि त्रिलोकीनाथ की शरण में आने के बाद भी यदि विचार इधर-उधर भटक रहे हैं, तो समझ लेना चाहिए कि अभी वास्तव में प्रभु की शरण में प्रवेश नहीं हुआ है।


