मधुमक्खियां शहद उत्पादन सहित फसलों के परागण में भी उपयोगी हैं

भास्कर न्यूज | अंबिकापुर राजमोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, अम्बिकापुर में विश्व मधुमक्खी दिवस पर आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. एस. के. सिन्हा के मार्गदर्शन में हुआ। इस अवसर पर मधुमक्खियों के संरक्षण, उनकी पारिस्थितिकीय भूमिका व कृषि उत्पादन में उनके महत्व पर चर्चा की गई। डॉ. सिन्हा ने अपने संबोधन में कहा कि मधुमक्खियां न केवल शहद उत्पादन में सहायक होती हैं, बल्कि फसलों के परागण में भी अत्यंत उपयोगी हैं, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है। उन्होंने बताया कि विश्व मधुमक्खी दिवस हर वर्ष 20 मई को स्लोवेनिया के बीकीपर एंटोन जान्सा की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्होंने वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन की नींव रखी थी। कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं को शुद्ध शहद का सेवन कराया गया और उसके स्वास्थ्य लाभों पर भी चर्चा की गई। वैभव कुमार जायसवाल ने मधुमक्खी पालन के उद्देश्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि परागणकर्ता न केवल कृषि उत्पादन में योगदान करते हैं, बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा, पोषण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। कार्यक्रम में महाविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. एके. नायक, डॉ. डीएस. महीपाल सहित कई शिक्षक, कर्मचारी, स्नातक व स्नातकोत्तर छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। इस आयोजन ने प्रतिभागियों को मधुमक्खियों की जैविक, आर्थिक व पर्यावरणीय उपयोगिता के प्रति जागरूक किया और उन्हें टिकाऊ कृषि प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित किया। उपस्थित सभी लोगों ने इसे भविष्य में भी आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया। वैकल्पिक कीट प्रबंधन उपायों को अपनाने कहा डॉ. केएल. पैंकरा ने भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मधुमक्खी प्रजातियों- एपिस डॉर्सेटा, एपिस सेरेना, एपिस मेलिफेरा और ट्राइगोना की विशेषताओं पर व्याख्यान दिया। वहीं, डॉ. सचिन ने रासायनिक कीटनाशकों से मधुमक्खियों की घटती संख्या और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों से वैकल्पिक कीट प्रबंधन उपायों को अपनाने का आग्रह किया।

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