मध्य शहर में घातक गैसें बढ़ीं:जलता कचरा, उद्योग-तंदूर में कोयले का उपयोग बड़ी वजह

शहर की आबोहवा में धूल के महीन कणों के साथ नाइट्रोजन, कार्बन और सल्फर की बढ़ती मात्रा भी चिंतित करने वाली है। मध्य शहर में नाइट्रोजन ऑक्साइड (नॉक्स) और आसपास के क्षेत्रों में सल्फर डाई ऑक्साइड (सॉक्स) मानक से ज्यादा मिली है। कार्बन मोनो ऑक्साइड भी तय मानक को पार करने के संकेत दे रही है। यह स्थिति सुबह-शाम में ज्यादा होती है।
तीन महीने की स्थिति देखें तो रीगल क्षेत्र में नॉक्स की मात्रा 101 तो रीजनल पार्क क्षेत्र में सॉक्स 48 से 52 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक दर्ज की गई, वहीं कार्बन मोनो ऑक्साइड दोनों ही क्षेत्र में 2 से 3 ग्राम के बीच है। इसकी बड़ी वजह उद्योग-तंदूर में कोयले का इस्तेमाल, कुछ स्थानों पर अभी भी कचरे का जलाना, पुराने वाहनों में डीजल का उपयोग, ट्रैफिक जाम की स्थिति, औद्योगिक क्षेत्रों में डीजल व कोयले आधारित बायलर्स, शहर के आसपास क्षेत्र में फसल अवशेषों का जलना है। सल्फर डाई ऑक्साइड
रीजनल पार्क, विजय नगर क्षेत्र में यह 25 से 52 माइक्रो ग्राम तक है। छोटी ग्वालटोली क्षेत्र में 15 से 30 के आसपास रहती है। सांस लेने में परेशानी व आंखों में जलन भी होती है। ठंड के दिनों में दृश्यता पर भी असर होता है। इसी के कारण धुंध बनती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड
मध्य शहर में यह 44 से 101 माइक्रो ग्राम है। रीगल, विजय नगर, रीजलन पार्क, एयरपोर्ट, जीपीओ क्षेत्र में भी 30 माइक्रोग्राम तक है। ट्रक, बस, कार, डीजल वाहन, तेल और गैस उत्पादन आधारित उद्योग, इनके बायलरों में जलने वाला कोयला, तंदूर व अन्य कई स्रोतों से निकलती है। असर श्वसन तंत्र पर होता है। एक्सपर्ट – डॉ. सलिल भार्गव, श्वास रोग विशेषज्ञ श्वास रोग के पीड़ित दोगुना तक बढ़ गए
एक्यूआई के पैटर्न में भी गैसीय तत्वों में बढ़ोतरी हो रही है, क्योंकि इसका असर शहर के लोगों के स्वास्थ्य पर देखा जा रहा है। अस्थमा बढ़ रहा है। पहले हॉस्पिटल में 20-25 मरीज रहते थे, अब यह संख्या 50 तक पहुंच गई है। गंभीरता बढ़ रही है। इसलिए अब ठंड या गर्मी में ही नहीं, प्रदूषण में सुधार के लिए सालभर प्रयास करना होंगे।
एक्सपर्ट – डॉ. ओपी जोशी, पर्यावरणविद ​​​​​​​कोयले का उपयोग तत्काल कम करना होगा
जिस तरह से नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड बढ़ रही है, यह भविष्य में शहर को प्रभावित कर सकती है। उद्योगों व तंदूर में कोयले की जगह सीएनजी के उपयोग के लिए प्रेरित करना होगा। पुराने वाहनों की जांच कर इनको भी बाहर करना चाहिए। शहर के आसपास जल रहे कचरे व पराली पर नियंत्रण करने की जरूरत है। ​​​​​​​

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