मन को पहचानें, जितना दौड़ेगा उतना दुर्गति करेगा

ब्यावर| आचार्य रामेश के शिष्य शासन दीपक श्रुत प्रभजी ने समता भवन में प्रवचन के दौरान भजन के माध्यम से कहा कि तेरे सुख की एक ही दशा, तू भीतर आ-तू भीतर आ, ना कोई दूसरी दशा, तू भीतर आ तू भीतर आ… भौतिक सुख रियल सुख नहीं होता, आत्मा का सुख रियल सुख है। व्यक्ति को सोचने में पुरुषार्थ नहीं कर काम में पुरुषार्थ करना चाहिए। सारी परेशानी उधेड़ मन की होती है, हमारा चित्त निरंतर दौड़ रहा है, जो उतना दुखी होता जा रहा है, क्योंकि मन विचारों में कल्पना में दौड़ता जा रहा है। जो अशांति उत्पन्न करता जा रहा है। उन्होंने कहा कि शांत चित्त वाला व्यक्ति ही ध्यान के योग्य होता है।

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