मध्यप्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों पर सख्त रुख अपनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। कंपनी प्रबंधन ने विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होने पर कार्यपालन अभियंता मुकेश सिंह को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। कंपनी ने यह कार्रवाई शासन को करोड़ों रुपए की वित्तीय क्षति पहुंचाने के मामले में की है। अल्ट्राटेक सीमेंट को अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप मुकेश सिंह पर मेसर्स अल्ट्राटेक सीमेंट (विचारपुर कोल माइंस) को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए कूटरचित दस्तावेज तैयार करने का गंभीर आरोप था। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर अल्ट्राटेक सीमेंट ने अदालत में याचिका दायर की, जिसमें हाईकोर्ट जबलपुर ने कंपनी के पक्ष में 8.50 करोड़ रुपए का भुगतान 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित करने का आदेश दिया। इस आदेश से शासन को भारी वित्तीय नुकसान हुआ, जिसके लिए कंपनी ने कार्यपालन अभियंता को जिम्मेदार माना। पदस्थापना के दौरान की गई गड़बड़ी मुकेश सिंह 6 सितंबर 2018 से 14 जनवरी 2021 तक संचालन एवं संधारण संभाग शहडोल में पदस्थ थे। विभागीय जांच में उन पर मुख्य रूप से दो आरोप सिद्ध हुए हैं। हाईकोर्ट के आदेश से हुआ खुलासा कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर दायर याचिका में हाईकोर्ट जबलपुर ने 6 मई 2024 को अल्ट्राटेक सीमेंट के पक्ष में निर्णय देते हुए 8.50 करोड़ रुपए का भुगतान 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित करने का आदेश दिया। इसके बाद विभागीय स्तर पर मामले की गंभीरता से जांच की गई। निलंबन से बर्खास्तगी तक मुकेश सिंह को 16 दिसंबर 2024 को निलंबित किया गया था। हाईकोर्ट के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में 23 अप्रैल 2025 को उन्हें आरोप पत्र जारी किया गया। निर्धारित समय में जवाब प्रस्तुत नहीं करने पर 9 मई 2025 को महाप्रबंधक वाणिज्य पीके अग्रवाल को जांचकर्ता अधिकारी नियुक्त किया गया। जांचकर्ता अधिकारी ने 11 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। जांच में यह स्पष्ट पाया गया कि मुकेश सिंह द्वारा ही दो अलग-अलग कार्यपूर्णता और हैंडओवर प्रतिवेदन जारी किए गए थे, जिनमें 1 मार्च 2019 का दस्तावेज पूरी तरह कूटरचित था और दोनों पर उनके हस्ताक्षर मौजूद थे। जांच में भी किया असहयोग विभागीय जांच के दौरान मुकेश सिंह ने लगातार असहयोगात्मक रवैया अपनाया। उन्होंने जांच में विलंब करने के लिए बार-बार प्रयास किए, चिकित्सा अवकाश का दुरुपयोग किया और पत्नी व भाई के ई-मेल से अवकाश आवेदन भेजे। उन्होंने कंपनी के पत्राचार लेने से इनकार किया और अनुशासनिक प्राधिकारी व जांचकर्ता अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी लगातार आक्षेप लगाए। प्रबंध संचालक ने अभ्यावेदन किया खारिज जांचकर्ता अधिकारी की रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजों के गहन अध्ययन के बाद प्रबंध संचालक अनय द्विवेदी ने मुकेश सिंह का अभ्यावेदन अमान्य कर दिया। चूंकि दोनों आरोप पूर्णतः सिद्ध पाए गए और शासन को 8.50 करोड़ रुपए की वित्तीय क्षति हुई, इसलिए मप्र सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के नियम 10 के तहत उन्हें तत्काल प्रभाव से कंपनी सेवाओं से बर्खास्त करने का आदेश जारी किया गया।


