भास्कर न्यूज|गढ़वा जहां एक ओर मानसून की बारिश ने किसानों की उम्मीदों को तो जगाया है, वहीं आम लोगों की थाली से सब्जियां गायब होती जा रही हैं। महंगाई ने इस कदर पैर पसार लिया है कि अब गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए हरी सब्जियां खरीदना किसी चुनौती से कम नहीं है। सब्जियों के दामों में हाल के दिनों में जिस तेजी से उछाल आया है, उसने हर किसी की जेब ढीली कर दी है। गढ़वा सब्जी मंडी की बात करें तो टमाटर, बैगन, करैला, परवल, कंदा, जैसे आम सब्जी के दाम आसमान छू रहे हैं। जहां कुछ सप्ताह पहले टमाटर 30 से 40 प्रति किलो बिक रहा था, वहीं अब इसकी कीमत 80 रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। वहीं गोभी सौ रुपए किलो, हरी मिर्च 140 रुपए किलो, धनिया पत्ती 400 रुपए किलो, भिंडी 50 रुपए किलो, करेला 60 रुपए किलो और बैंगन 60 रुपए किलो बिक रहे हैं। ऐसे में गरीब वर्ग के लिए तो सब्जी खरीदना जैसे लग्जरी बन गया है। स्थानीय निवासी संजय साहू बताते हैं, “अब सब्जी लेना आसान नहीं रहा। पहले हर दिन दो से तीन सब्जियां बनती थीं, लेकिन अब हफ्ते में सिर्फ दो बार ही सब्जी खरीदते हैं। बाकी दिन आलू या चना-चना दाल से काम चलाना पड़ता है। महिलाएं जो घर के बजट का संतुलन बनाकर चलाती हैं, अब असहाय महसूस कर रही हैं। गढ़वा की गृहणी रीना देवी कहती हैं कि बच्चों को हरी सब्जी की आदत थी, लेकिन अब उनके मनपसंद सब्जियां लाना मुश्किल हो गया है। क्या करें, रोज़ के खर्चे पहले ही इतने हैं, ऊपर से सब्जी महंगी हो गई।” सब्जी विक्रेताओं का भी कहना है कि बारिश की वजह से कई इलाकों में फसलें खराब हो गई हैं, जिससे आपूर्ति पर असर पड़ा है। साथ ही, पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी माल ढुलाई खर्च बढ़ा रही हैं, जिसका सीधा असर सब्जी के खुदरा दामों पर पड़ा है। सब्जी विक्रेता रामेश्वर गुप्ता ने बताया कि बरसात में सब्जियां जल्दी खराब हो जाती हैं, जिससे नुकसान ज्यादा होता है। ऊपर से बाजार में माल कम आ रहा है। ऐसे में दाम बढ़ना तय है। हम भी मजबूरी में ऊंचे दाम पर बेच रहे हैं। इस महंगाई की मार सिर्फ गढ़वा ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य में महसूस की जा रही है। लेकिन गढ़वा जैसे छोटे शहर में जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं, वहां इसकी मार ज्यादा असर कर रही है। दिनभर मेहनत करने के बाद जब आम मजदूर शाम को घर लौटता है तो उसकी थाली में दो रोटी और एक सब्जी तक नहीं मिल पा रही। विशेषज्ञों की मानें तो जब तक बारिश का दौर थमता नहीं और नई फसल बाजार में नहीं आती, तब तक राहत की उम्मीद नहीं की जा सकती।


