महाकौशल में अब नहीं गूंजेगा ‘जय लंकेश’:72 वर्षीय रावण भक्त का निधन, 50 साल से कर रहे थे पूजा; दोस्तों से कहा था- ये आखिरी त्योहार

महाकौशल अंचल में बीते 50 सालों से हर दशहरे पर “जय लंकेश, जय लंकेश” की गूंज सुनाई देती थी। इस आवाज के पीछे थे जबलपुर के पाटन निवासी लंकेश उर्फ़ संतोष नामदेव। शनिवार को हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। लंकेश की मौत की खबर लगते ही पूरे जिले में शोक की लहर दौड़ गई। दशानन का किरदार निभाने वाले इस रावण भक्त ने अपने जीवनकाल में देहदान किया था, लेकिन उनकी पत्नी ने अनुमति नहीं दी। इसके चलते रविवार को पाटन मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। संतोष की आखिरी इच्छा थी कि उनका अंतिम सफर ढोल, शहनाई और आतिशबाज़ी के साथ निकले। उनके दोस्तों ने इस इच्छा को पूरा करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। सैनिक से बने रावण पाटन के संतोष नामदेव, जिन्हें लोग प्यार से लंकेश कहते थे, कभी दशहरा मैदान में सैनिक की भूमिका निभाते थे। मगर उनकी बुलंद आवाज और दमदार संवाद ने उन्हें रावण बना दिया, और फिर यही किरदार उनकी जिंदगी बन गया। संतोष के परिवार की पुश्तैनी टेलर की दुकान है। पिता चाहते थे कि बेटा दुकान संभाले, लेकिन संतोष का मन रामलीला में बसता था। एक बार जब मंच संचालकों ने उन्हें रावण की भूमिका दी, तो उनके संवादों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। तभी से वे रावण के भक्त बन गए। रामलीला के श्लोकों से प्रेरित होकर उन्होंने रावण को भगवान शिव का परम भक्त मानते हुए उसकी पूजा शुरू की। शुरू में पत्नी ने इसे मजाक समझा, लेकिन जब संतोष ने पूजा घर में रावण की प्रतिमा स्थापित कर दी, तो दोनों के बीच विवाद भी हुआ। धीरे-धीरे संतोष पूरी तरह “लंकेश” बन गए। उन्होंने अपनी दुकान का नाम जय लंकेश टेलर्स रखा और अपने दोनों बेटों को मेघनाथ और अक्षय नाम से पुकारने लगे। राक्षस कुल को तारने के लिए रावण ने किया हर कार्य लंकेश का मानना था कि लंका के राजा रावण में भले ही कुछ कमियां रही हों, लेकिन उनके भीतर असीम ज्ञान और विद्वता थी। वे कहते थे कि मैं रावण की अच्छाइयों को आगे बढ़ा रहा हूं। रावण महान पंडित थे, उनमें कोई अवगुण नहीं था। संतोष नामदेव उर्फ लंकेश पिछले 50 वर्षों से रावण की आराधना कर रहे थे। उनका कहना था कि जो भी उन्हें जीवन में मिला, वह रावण भक्ति का ही फल है। उनकी हर मनोकामना रावण की कृपा से पूरी हुई। लंकेश का विश्वास था कि लंकाधिपति रावण ने जो भी किया, वह अपने राक्षस कुल को तारने के लिए किया। उन्होंने माता सीता का अपहरण तो किया, लेकिन उन्हें अशोक वाटिका में रखा, जहां न कोई नर, न राक्षस, और न ही पशु-पक्षी तक जाने की अनुमति थी। बेटों की शादी के कार्ड में भी छपवाया ‘जय लंकेश’ रावण भक्त संतोष नामदेव ने अपनी भक्ति को जीवन के हर पल में उतार दिया था। उन्होंने अपने दोनों बेटों के नाम मेघनाथ और अक्षय रखे थे। 2016 में जब छोटे बेटे मोनू की शादी हुई, तो उन्होंने विवाह कार्ड पर “पं. जय लंकेश गुरुदेवाय नम:” लिखवाया। निमंत्रण पत्र देखकर लोग चौंक गए। कई लोगों ने कहा कि शादी के कार्ड पर भगवान गणेश के नाम की जगह ‘जय लंकेश’ लिखना उचित नहीं है, लेकिन संतोष ने किसी की परवाह नहीं की। कहा जाता है कि पूरे महाकौशल ही नहीं, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में उनसे बड़ा रावण भक्त कोई नहीं था। दशहरा के दौरान उनके रावण पंडाल में जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों से लोग जुटते थे। दशहरा में लंकेश प्रतिमा की स्थापना संतोष नामदेव जितना भगवान राम और शिव की उपासना करते थे, उतनी ही श्रद्धा से वे रावण की भी पूजा करते थे। उनका मानना था कि रावण प्रखर, विद्वान और दानवों में सबसे बुद्धिमान थे, और यही वजह थी कि वे भगवान शिव के बड़े भक्त कहलाए। पेशे से टेलर मास्टर रहे संतोष ने 1975 में पहली बार अपने घर में रावण की पूजा शुरू की। इस पर परिवार, रिश्तेदार और पड़ोसियों ने विरोध किया, लेकिन उन्होंने सबकी बातों को नजरअंदाज कर रोजाना पूजा जारी रखी। जहां लोग दशहरे पर रावण दहन में शामिल होते हैं, वहीं संतोष उर्फ लंकेश रावण की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें विसर्जित करते थे। शुरुआत में पाटन क्षेत्र में उनका विरोध हुआ, लेकिन उनकी भक्ति देखकर धीरे-धीरे लोग उनके साथ जुड़ते गए। अब जब लंकेश की पूजा होती थी, तो बच्चे और बड़े सभी बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर “जय लंकेश” बोलते थे। दोस्त से बोले– शायद ये आखिरी त्योहार नवरात्रि के बाद दशहरा में जहां रावण दहन होता था, वहीं संतोष नामदेव उर्फ़ लंकेश रावण की पूजा कर प्रतिमा को नर्मदा नदी में विसर्जित करने जाते थे। उनके परम मित्र दीपक जैन हर साल उनके साथ ऑटो में रावण की प्रतिमा लेकर विसर्जन के लिए चलते थे। शनिवार दोपहर को संतोष ने दीपक से मुलाकात की और कहा कि शाम चार बजे नर्मदा नदी जाना है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस बार लंकेश महाराज यह आयोजन नहीं चाहते और शायद यह उनका अंतिम विसर्जन हो। दीपक ने उनकी चिंता को टालते हुए कहा कि ऐसी बातें मत करो, घर जाओ और तैयार हो जाओ, थोड़ी देर में हम चलेंगे। पत्नी ने फोन कर बताया– संतोष की तबियत अचानक बिगड़ी संतोष उर्फ़ लंकेश के दोस्त और भाजपा पार्षद दीपक जैन ने बताया कि दोपहर में बातचीत के बाद वह पाटन की काली माता विसर्जन कार्यक्रम में शामिल हो गए थे। शाम करीब 4 बजे संतोष की पत्नी का कॉल आया कि उनकी तबियत अचानक बिगड़ गई है। तुरंत घर पहुंचे और उन्हें पाटन स्वास्थ्य केंद्र ले गए, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। दीपक जैन ने बताया कि कोरोना काल 2021 में संतोष ने बिना किसी को बताए अकेले ही जबलपुर कलेक्टर से मिलकर अपनी देहदान की इच्छा पूरी कर दी थी। हालांकि, परिवार इस कदम के लिए तैयार नहीं था। राम मंदिर दर्शन की थी अंतिम इच्छा रावण के भक्त संतोष नामदेव पूजा के दौरान हमेशा “ओम नमः शिवाय” के साथ-साथ “जय लंकेश” का जाप करते थे। उनकी अंतिम इच्छा थी कि अयोध्या जाकर भगवान राम के दर्शन कर सकें। दोस्तों के बीच बैठकर संतोष अक्सर कहते थे कि अब राम मंदिर बनकर तैयार हो गया है, इसलिए उनकी यह अंतिम इच्छा है कि वह रामलला के दर्शन करें। उनका मानना था कि दशानन रावण ने भी अपने अंतिम समय में भगवान श्रीराम के दर्शन किए थे, इसी तरह वे भी अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करना चाहते थे। यह खबर भी पढ़ें… हार्ट अटैक से जबलपुर के लंकेश की मौत:50 सालों से कर रहे थे रावण की पूजा जबलपुर के पाटन में रहने वाले लंकेश उर्फ संतोष नामदेव की शनिवार शाम को हार्ट अटैक से मौत हो गई। 72 साल के लंकेश रावण की पूजा करने के लिए न सिर्फ जबलपुर बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में प्रसिद्ध थे। पेशे से टेलर लंकेश ने पहली बार 1975 में रावण की पूजा की थी। उसके बाद से हर साल उन्होंने पाटन में एक स्थान बनाकर पूजा करना शुरू किया। पढ़ें पूरी खबर…

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