बबलू उरांव|लोहरदगा जिले के पहाड़ी और पठारी इलाकों में महुआ फल ग्रामीणों के लिए मौसमी रोजगार का बड़ा जरिया है। हर साल मार्च से मई तक ग्रामीण परिवार महुआ चुनते हैं। कुछ के पास निजी पेड़ हैं, तो कुछ जंगलों में उगने वाले पेड़ों से महुआ बटोरते हैं। लोग सुबह, दोपहर और शाम में महुआ चुनते हैं। फिर उसे सुरक्षित जगहों पर सुखाते हैं। बाद में बाजार या हाट में बेचकर आमदनी करते हैं। पहाड़ी इलाकों में एक परिवार 10 से 20 क्विंटल तक महुआ चुनता है। कुछ लोग तुरंत बेच देते हैं। कुछ लोग घर में रखकर बरसात या अन्य सीजन में बेचते हैं। तब महुआ का दाम ज्यादा मिलता है। वहीं महुआ फल के बाद उसके दाने डोरी का तेल निकाल कर भी उसे बेचा जाता है। इसके तेल भी कई कार्य में उपयोग किए जाते हैं। अधिकतर लोग महुआ फल से देसी शराब बनाते हैं। हालांकि महुआ से कई तरह के खाद्य उत्पाद भी तैयार होते हैं। इससे जूस, रस, जैम, अचार और पाउडर बनाए जाते हैं। महुआ का रस स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है। इसमें विटामिन सी, पोटैशियम और फाइबर जैसे तत्व होते हैं। यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है। पाचन तंत्र को ठीक रखता है। त्वचा और बालों के लिए भी फायदेमंद है। मधुमेह और हृदय रोगों में भी इसके लाभ देखे गए हैं। महुआ से बना जैम स्वादिष्ट स्प्रेड के रूप में खाया जाता है। अचार भी लोगों को खूब पसंद आता है। पाउडर कई व्यंजनों में उपयोग होता है। लातेहार जिला प्रशासन ने सखी महिला मंडल को महुआ से खाद्य उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया है। पर गांवों में बड़ी संख्या में महिलाओं को प्रशिक्षण देने की जरूरत है। अभियान चलाकर महिलाओं को अचार और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने की विधि सिखानी होगी। तभी नशीले पेय बनाने की प्रवृत्ति में कमी आएगी। जिले में कई प्रशिक्षण केंद्र हैं, लेकिन महुआ से खाद्य उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। यही वजह है कि महुआ का उपयोग नशीले पदार्थ बनाने में ज्यादा हो रहा है।


