मामा बालेश्वर दयाल को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग:झाबुआ में अनुयायी बोले-उनके जीवन परिचय को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए

झाबुआ के बामनिया स्थित ‘भील आश्रम’ में आदिवासियों के मसीहा,स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मामा बालेश्वर दयाल की 27वीं पुण्यतिथि (26 दिसंबर) से एक दिन पहले ही हजारों अनुयायी उमड़ पड़े हैं। मध्य प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान और गुजरात से भी बड़ी संख्या में लोग बिना किसी निमंत्रण के यहां पहुंचे हैं। 1937 में डूंगर विद्यापीठ भील आश्रम की स्थापना की थी अनुयायियों का कहना है कि मामा बालेश्वर दयाल ने अपना पूरा जीवन गरीब आदिवासियों और उपेक्षित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित किया था। उन्होंने 1937 में बामनिया में डूंगर विद्यापीठ भील आश्रम की स्थापना की। उन्होंने ‘बेगार प्रथा’ के खिलाफ सफल संघर्ष कर आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाई। मामाजी ने समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए अपने परिवार का भी त्याग कर दिया था और जीवनभर एक छोटी कुटिया में रहकर सादगी का उदाहरण प्रस्तुत किया। लोग बोले-वर्तमान व्यवस्था उनकी विरासत को सहेजने में विफल 26 दिसंबर 1998 को उनके निधन के इतने सालों बाद भी उनकी ऐतिहासिक कुटिया और भील आश्रम उपेक्षा का शिकार हैं। हर साल पुण्यतिथि पर राजनेता यहां आकर संरक्षण के दावे करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। अनुयायियों का आरोप है कि वर्तमान व्यवस्था उनकी विरासत को सहेजने में विफल रही है। मामा बालेश्वर दयाल को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ देने की मांग इस वर्ष राजस्थान और गुजरात से आए अनुयायियों ने सरकार से दो प्रमुख मांगें की हैं। उनकी पहली मांग है कि मामा बालेश्वर दयाल को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाए। दूसरी मांग यह है कि उनके प्रेरणादायी जीवन परिचय को सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, ताकि युवा पीढ़ी उनके योगदान से परिचित हो सके। पुण्यतिथि के अवसर पर बामनिया के स्कूल मैदान में एक मेले का आयोजन किया गया है। यहां नारियल, पुष्पहार और मामाजी के चित्रों की दुकानें सजी हुई हैं।

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