मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पुरुषों से आगे होने के बावजूद प्रदेश की महिला उद्यमियों को सरकारी योजनाओं के तहत ऋण देने में बैंकों की रुचि बेहद कम है। मुख्यमंत्री नारी शक्ति उद्यम प्रोत्साहन योजना के तहत 2025-26 की पहली छमाही में ऋण वितरण के आंकड़ों ने यह चिंताजनक स्थिति को उजागर किया है। राज्य स्तरीय बैंकर्स कमेटी (एसएलबीसी) के अनुसार, योजना में शामिल 30 बैंकों को कुल 1,200 महिला उद्यमियों को ऋण देने का लक्ष्य दिया था, लेकिन पहली छमाही तक 33 फीसदी लक्ष्य ही पूरा हुआ है। सरकारी बैंकों की स्थिति और चिंताजनक है। 12 सरकारी बैंकों को एक साल में 777 महिला आवेदकों को ऋण देने का लक्ष्य मिला था, लेकिन छह माह में केवल 23 फीसदी लक्ष्य ही पूरा हो सका। पहली तिमाही में यह आंकड़ा महज 8 फीसदी रहा। निजी क्षेत्र के बैंकों का प्रदर्शन भी बेहद कमजोर रहा और उनका ऋण वितरण 10% से नीचे रहा। पेंडिंग आवेदन लगातार बढ़ रहे : योजना में पहली तिमाही तक 4,521 आवेदन पेंडिंग थे, जो दूसरी तिमाही में 7 फीसदी बढ़कर 4,845 हो गए। इनमें से 4,059 आवेदन 90 दिन से अधिक समय से लंबित हैं। राजस्थान ग्रामीण बैंक ने 50 फीसदी से अधिक लक्ष्य हासिल किया सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि योजना में शामिल 30 बैंकों में से तीन सरकारी समेत कुल 17 बैंकों ने अब तक एक भी खाता नहीं खोला। पंजाब नेशनल बैंक और राजस्थान ग्रामीण बैंक ही ऐसे हैं, जिन्होंने 50 फीसदी से अधिक लक्ष्य हासिल किया। इसके उलट एसबीआई लक्ष्य का मात्र 0.6 फीसदी ही पूरा कर सका, जबकि एसएलबीसी संयोजक बैंक ऑफ बड़ौदा 25 फीसदी लक्ष्य तक ही पहुंच पाया। योजना की निगरानी कर रहे महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव एसएलबीसी की बैठकों में बार-बार ऋण वितरण की धीमी गति पर चिंता जता चुके हैं। विभाग ने पहली छमाही तक बैंकों को 2,354 आवेदन भेजे, जिनमें से 570 को मंजूरी मिली, लेकिन केवल 298 महिला उद्यमियों को ही ऋण मिल सका। सरकारी बैंकों में PNB सबसे आगे
12 सरकारी बैंकों को 1,646 आवेदन भेजे। इनमें से 359 आवेदन मंजूर हुए और 181 को ऋण दिया। पीएनबी ने सबसे अधिक ऋण दिए। बैंक ऑफ महाराष्ट्र, इंडियन बैंक और पंजाब एंड सिंध बैंक को कुल 65 ऋण देने थे, लेकिन इन्होंने एक भी ऋण नहीं दिया। भास्कर एक्सपर्ट- योजना की निगरानी के लिए कमेटी बनाए सरकार बैंक सुरक्षित लोन को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। सरकारी योजनाओं के तहत ऋण में रुचि नहीं दिखाते। कुछ सरकारी व निजी बैंकों का योजना पर फोकस ही नहीं है। वहीं, रिजर्व बैंक निर्देश देने से आगे नहीं बढ़ पाता। ऐसे में सरकार को प्रभावी निगरानी के लिए कमेटी बनानी चाहिए। यदि 30 दिन में आवेदन का निर्णय नहीं होता है, तो संबंधित बैंक अधिकारी को जवाबदेह बनाया जाए। अन्यथा यह योजना फेल हो जाएगी। बैंकों को ऋण स्वीकृति प्रक्रिया सरल बनानी चाहिए।


