पिछले दो साल से मैं टेली-मानस की उस फोन लाइन को अटैंड करती हूं, जहां कॉल करने वाले लोग फोन पर मरने की इच्छा जताते हैं। यह कोई सामान्य हेल्पलाइन नहीं, बल्कि वह आखिरी नंबर होता है, जिसे लोग तब मिलाते हैं जब उनके भीतर सब कुछ टूट चुका होता है। मेरे लिए यह महज एक नौकरी नहीं है। यह हर दिन किसी अनजान इंसान की जिंदगी अपने शब्दों से थामे रखने की कोशिश है। रोज आत्महत्या के विचार सुनना, टूटे हुए लोगों से बात करना और उनकी बेबसी महसूस करना, भीतर से कमजोर करता था। कई बार बिना किसी वजह, मेरे मूड में बदलाव आते थे। मैं खुद को खाली, उदास और असहाय महसूस करती थी। धीरे-धीरे समझ आया कि अगर मैं खुद को संभालना नहीं सीखूंगी, तो किसी और को संभाल पाना संभव नहीं होगा। मैंने पढ़ना शुरू किया, खुद पर ध्यान दिया और अपनी सीमाएं तय कीं। हाल ही एक कॉल आया। 17 साल का एक लड़का, जो जेईई की तैयारी कर रहा था। वह बेहद तनाव में था और कई बार आत्महत्या का ख्याल उसके मन में आ चुका था। उससे एक कॉल पर बात खत्म नहीं हुई। 5 फॉलो-अप सेशन हुए। उसके साथ सांस की एक्सरसाइज की गईं। उसे होप किट दी गई। ऐसे लोगों को बार-बार यह याद दिलाना जरूरी होता है कि उनकी जिंदगी में ऐसे लोग और कारण हैं, जिनके लिए वे मायने रखते हैं। शुरुआत में वह बात करने को तैयार नहीं था। सिर्फ नकारात्मक बातें करता था। लेकिन धीरे-धीरे उसने अपनी जिंदगी की अहमियत समझनी शुरू की। कई कॉल बेहद चुनौतीपूर्ण होती हैं। एक गंभीर ओसीडी मरीज का फोन आया, जो किसी से मिलने या बात करने को तैयार नहीं था। उसे हर समय बीमार पड़ जाने का डर रहता था। भरोसा बनने में वक्त लगा, लेकिन अंत में बात इलाज तक पहुंची। कई बार घर लौटकर भी दिमाग शांत नहीं होता। कई आवाजें, कई कहानियां साथ चली आती हैं, लेकिन जब किसी कॉल के अंत में कोई कहता है कि वह आज खुद को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, तो लगता है कि सारी थकान की कोई कीमत है।
-जैसा बकुल महेश माथुर को बताया


