मैहर में गीता महोत्सव में समझाए गए श्लोक:बटुकों ने किया सामूहिक पाठ, 3 दिसंबर को होगा कार्यक्रम का समापन

मैहर के बड़ा अखाड़ा परिसर में सोमवार को गीता जयंती का भव्य आयोजन उत्साह और श्रद्धा के साथ किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध कथावाचक सम्पूज्य पारासर जी महाराज ने की, जिन्होंने गीता पर विशेष उद्बोधन दिया। इस अवसर पर श्री सीता वल्लभ शरण जी महाराज भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान गीता के पवित्र श्लोकों का सामूहिक पाठ किया गया। इस आयोजन में जिले के संत-महात्माओं के साथ कलेक्टर रानी बाटड़, पुलिस अधीक्षक अवधेश प्रताप सिंह, एसडीएम दिव्या पटेल, जनपद सीईओ अशोक तिवारी, संतोष सोनी और देवेंद्र पाण्डेय सहित कई गणमान्य नागरिक मौजूद थे। यह आयोजन मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग, विश्व गीता प्रतिष्ठान, भगवान परशुराम विकास बोर्ड और वीर भारत न्यास के संयुक्त तत्वावधान में प्रदेशभर में एक साथ आयोजित गीता जयंती समारोह का हिस्सा था। राज्यव्यापी इस आयोजन में तीन लाख से अधिक छात्र-छात्राओं ने श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय का सामूहिक वाचन किया। मैहर में बड़ा अखाड़ा परिसर में हुए मुख्य कार्यक्रम में नगर की 8 शिक्षण संस्थाओं के 1100 से अधिक विद्यार्थियों ने एक साथ गीता पाठ किया। गीता प्रदर्शनी, संतों का आशीर्वचन और वक्ताओं के उद्बोधन इस कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण रहे। दस दिनों से चल रहे गीता जयंती महोत्सव का समापन 3 दिसंबर को शासकीय संगीत महाविद्यालय में शाम 7 बजे होगा। समापन समारोह में भगवान श्रीकृष्ण पर आधारित लघु नाटिका, राधा-कृष्ण नृत्य और भजन कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। क्यों मनाई जाती है गीता जंयती मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। यानि इसी दिन श्रीमद्भगवद गीता जन्म हुआ था। गीता जयंती का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ गीता के श्लोक आज 21वीं सदी में भी लोगों को जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। इसमें धर्म के साथ कर्म का मर्म समाहित है। सही मायने में कहा जाए तो यह कर्म, भक्ति और ज्ञान का संगम है, जिसमें डुबकी लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में जरूर सफलता मिलती है। भगवान श्री कृष्ण के द्वारा कहे गए गीता के अनमोल वचन व्यक्ति को कठिन समय में जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। गीता में कहा गया है कि किस तरह कठिन से कठिन समय में भी कर्म करते हुए धर्म का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। सही मायने में देखा जाए तो श्रीमद्भगवद गीता में जीवन की हम समस्या का समाधान ​मिलता है। गीता के प्रथम श्लोक का क्या है मर्म धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय. भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए उपदेशों से जुड़ी गीता के पहले श्लोक के पहले दो शब्द पर यदि गौर करें तो इसमें पूरी श्रीमद्भगवद गीता का सार समाहित है। ये दो शब्द हैं धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे। यह संदेश देता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म के क्षेत्र में धर्म का अनुसरण करें। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि धर्म ही मनुष्य का पिता, माता, भाई, मित्र, रक्षक और स्वामी है। इसलिए कर्म करते हुए किसी भी सूरत में धर्म का साथ न छोड़ें। गीता के जरिए श्रीकृष्ण ने दिया है ये संदेश
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं – ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:’, अर्थात व्यक्ति का सिर्फ कर्म करने पर अधिकार है फल पर नहीं. ऐसे में उसे कर्म को फल की इच्छा लिए हुए नहीं बल्कि कर्तव्य समझकर करना चाहिए. इसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों को गीता के जरिए संदेश देते हैं कि – ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:’ यानि पृथ्वी पर जब-जब धर्म की हानि और अधर्म बढ़ता है तो भगवान स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेते हैं।

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